गाँव की यादें बुलाये मुझे, घर आजा, घर आजा पुकारे मुझे 

गाँव की यादें

गाँव की यादें बुलाये मुझे, घर आजा, घर आजा पुकारे मुझे |

वो बचपन का खेला, वो मिटटी का ठेला |

खेतों मैं जाकर, वो छुपना छिपाना ||

वो तितली पकड़कर, उछलना मचलना |

वो कपडे की गुडिया सुलाए मुझे ||

घर आजा, घर आजा बुलाये मुझे |

घर से मैं निकला हूँ, पैसे कमाने |

दर- दर भटकता, मैं दाना जुटाने ||

मेहनत की रोजी मुझे मिल गई जब |

बापू की बातें मेरी सच हुई अब ||

मगर मुझको भाये ना, अब भी कोई घर |

वो कंचे की खन- खन,  बुलाये मुझे ||

घर आजा, घर आजा बुलाये मुझे |

 

मेरे दिन का सूरज, ढलता है जब भी |

भूखी रहूँ मैं, ना जाऊं कहीं भी ||

वो चिड़ियों की चूं- चूं, पेड़ों की सर- सर |

मुझे याद आती है, माई की गोदी ||

मेरी रात होती है, जब भी कहीं पर |

 

बांधे मुझे वो, ममता का आँचल ||

वो धारे का पानी, खिली पीली सरसों |

वो बापू की ऊँगली, बुलाये मुझे ||

घर आजा, घर आजा पुकारे मुझे |

गाँव की यादें बुलाये मुझे

सुजाता देवराड़ी 

Source : https://swetadevrari.blogspot.com/2019/10/blog-post_94.html?m=1

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