निकाय चुनाव पर आयोग और सरकार आमने-सामने

देहरादून। बुधवार को निकाय चुनाव को लेकर ठीक एक दिन पहले हाईकोर्ट की शरण लेने वाले राज्य निर्वाचन आयोग ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। राज्य निर्वाचन आयुक्त सुबर्द्धन ने सरकार पर असहयोग और उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि वह चुनाव के सिलसिले में जुलाई 2017 से मुख्यमंत्री से वार्ता करना चाहते थे, मगर उन्हें अब तक समय नहीं दिया गया। साथ ही कहा कि आयोग तो तीन मई से पहले चुनाव कराने को तैयार था, मगर सरकार इसे लटकाती रही। ऐसे में आयोग को मजबूरन कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

राज्य निर्वाचन आयुक्त सुबर्द्धन ने रिंग रोड स्थित कार्यालय के सभागार में बुलाई गई प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि आयोग ने निकाय चुनाव के मद्देनजर सितंबर 2017 से कवायद प्रारंभ कर दी थी। तब अक्टूबर में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कर दिया गया था। ये मानकर चला जा रहा था कि चुनाव मार्च-अपै्रल में होंगे। ये जानकारी होने के बाद भी सरकार ने सीमा विस्तार व उच्चीकरण की कार्रवाई की।  उन्होंने कहा कि इस सबके मद्देनजर वह मुख्यमंत्री से वार्ता करना चाहते थे। जुलाई 2017 में जब उन्होंने समय मांगा तो अगले सोमवार की बात कही गई। यह सोमवार तब से नहीं आया। मुख्यमंत्री के पीएस के अलावा सचिव मुख्यमंत्री से भी बात की गई, मगर वार्ता का समय नहीं दिया गया।

सुबर्द्धन के मुताबिक शहरी विकास मंत्री मीडिया के जरिये भरोसा दिलाते रहे कि चुनाव समय पर करा देंगे, मगर आज की तारीख में न परिसीमन पूरा हुआ और न आरक्षण का निर्धारण। आयोग ने ये भी सुझाव दिया था कि जिन निकायों में सीमा विस्तार को लेकर लोग कोर्ट गए हैं, उन्हें छोड़ बाकी में चुनाव करा दिए जाएं, इसे भी नहीं माना गया। बाद में सरकार ने जवाब दिया कि नौ अपै्रल तक अधिसूचना जारी कर सकते हैं, मगर ऐसा संभव नहीं था। सूरतेहाल साफ है कि सरकार चुनाव को तैयार नहीं थी।

उन्होंने कहा कि चुनाव कराना आयोग की जिम्मेदारी है और उसकी राय मानना सरकार की, लेकिन सरकार, आयोग को नजरअंदाज कर रही है। और तो और, ईवीएम से चुनाव की मंशा जताने के बावजूद इसके लिए फूटी कौड़ी तक नहीं दी गई, जबकि आयोग ने 17 करोड़ की मांग की थी। हालांकि, उन्होंने बदली परिस्थिति को संवैधानिक संकट मानने से इनकार किया। कहा कि अब चुनाव पर फैसला कोर्ट को करना है।

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