हिमालय में पाये जाने वाला औषधीय पादप का सेवन कोविड 19 से बचाव में हो सकता है मददगार -जानिए खबर

आर्चा, आर्चू , हिमालयन रूबर्बः उच्च हिमालय में पाये जाने वाला एक बहुमूल्य संकटग्रस्त औषधीय पादप।
क्यूँ आप जानते हैं या आपने सुना है औषधीय पादप आर्चा के बारे में?
क्यूँ आपने भी खायी है आर्चा के पत्तों की सब्जी तथा चटनी ?
क्यूँ आप जानते हैं आर्चा का सेवन कोविड 19 से बचाव में मददगार हो सकता है?
क्यूँ आर्थिक एवं श्वास्थ्य लाभ के लिये आप भी आर्चा की खेती करना चाहेंगे ?
आओ जानें आर्चा कैसे लाभकारी है।

भारत दुनिया के बारह मेगा-जैव विविधता वाले देशों में से एक है। यहां औषधीय एवं सगन्ध पादपों की एक विस्तृत विविधता के साथ ही समृद्व संख्या भी उपलब्ध है। यहां बडी़ संख्या में जातीय समूहों के बीच वितरित पौधों पर आधारित ज्ञान की परंपरा भी रही है। इसी परंपरागत ज्ञान पर आधारित उच्च हिमालय में पायी जाने वाली एक बहुमूल्य औषधीय प्रजाति है आर्चा, जिसको वन्सपतिजगत में रीहम इमोडी के नाम से जाना जाता है।

स्वाद में कड़वा, कसैला तथा खट्टा रीहम एक फ्लावरिंग तथा बारामासी शाकीय पौधा है। पोलीगोनेसी परिवार के इस औषधीय पादप को अंग्रेजी में हिमालयन रूबर्ब, इन्डियन रूबर्ब, रेड भिंन्ड पाइ पलांन्ट के नाम से जाना जाता है। रिहम को संस्कृत में गांधीनी, रेवाचैनी, हिन्दी में आर्चा, अरबी में रीवांड, फारसी में रेवाडचीनी, आयुर्वेद में अमलपर्णी, पीतामूली, गांधी नीरवेटिक नामों से भी जाना जाता है।

जीनस रीहम के अन्तर्गत शाकीय पौधों की लगभग 50 प्रजातियां शामिल हैं। जो ब्यापक रूप से एशिया तथा यूरोप में बितरित होने के साथ ही खेतों में उगायी जाती हैं। रीहम इमोडी या भारतीय रूबर्ब 2700 ईसा पूर्व से चीनी हर्बल मेडिसन में उपयोग की जाने वाली जडी़ बूटियों में से एक है।  रीहम का उपयोग में आने वाला मुख्य भाग इसकी जड़ तथा प्रकन्द है, मगर स्थानीय लोगों द्वारा इसकी पत्तियों की सब्जी तथा चटनी बना कर भी खाई जाती है।

रीहम का उपयोग इन्डियन तथा यूनानी चिकित्सा पद्मति के साथ ही यूरोपियन सिस्टम आफ मेडिसन में भी किया जाता है।  यूनानी चिकित्सा पद्मति में रीहम को रेवन्द चीनी कह कर उपयोग किया जाता है। रीहम सब-एल्पाइन तथा एल्पाइन हिमालय में 2800 से 4000 मी0 तक की ऊँचाई पर घास के मैदानों के साथ ही पत्थरों वाली ढलान, दरारोंऋपर मोरनी मिट्टी में प्राकृतिक एवं रोपड़ के रूप में पाया जाता है।

रीहम मूलरूप से भारत के उच्च हिमालय का नेटिभ यानि स्थानीय वासी है। भारत में यह हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, सिक्किम के साथ ही मयनमार, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान तथा चाइना में भी पाया जाता है। हरी तथा हल्के लाल रंग के साथ ही दिल के आकार वाली पत्तियों वाला बहुत ही महत्वपूर्ण रीहम यानि आर्चा, आर्चू उत्तराखन्ड में केदारनाथ, गंगोतरी, यमुनोतरी, हरकीदून, तुंगनाथ, रूद्रनाथ, किलपुड़, वैली आफ फ्लावर के साथ ही बागेश्वर तथा पिथौरागढ़ की ऊँची पहाडि़यों पर प्राकृतिक रूप में पाया जाता है।

औषधीय गुणों से परिपूर्ण रीहम का उपयोग विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में रेचक टानिक, मूत्रबर्धक और पुरातनता के बाद से होने वाले बुखार, खांसी, अपच के साथ ही मासिक धर्म विकार के उपचार के लिये किया जाता है।

रीहम में मुख्यतः एंन्थराक्विनोन (राइन, काइसोफेनाल, एलो-इमोडिन, इमोडिन, फिजियोकिम और उनके ग्लाइकोसाइडस्) और स्टिलबिन (पिकेटोल, रेसबेराट्राल और उनके ग्लाइकोसाइड्स) नामक रासायनिक घटक पाये जाते हैं। रीहम के पोधों के तनों यानि लीफ स्टाल्क में मिनिरल्स, फैट, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, फाइबर के साथ ही नमी पायी जाती है। रीहम के प्रकन्दों में पाये जाने वाले इसेंन्सियल आयल में यूजिनोय पाया जाता है।

शोध अध्यनों के अनुसार रीहम में एंन्टी कैंन्सर, एंन्टी औक्सीडेंन्ट, एंन्टी इंफ्लेमेटरी, एंन्टी माइक्रोबियल, एंन्टी फंगल, एंन्टी डिप्लिपिडेमिक, चींटी प्लेटलेट, एंन्टी डायबिटिक, एंन्टु लिसर, हिपेटोप्रैक्टिव, इम्यूनोहोनिन्नसिंग तथा नेप्रोपेक्टिव गुण पाये जाते हैं। स्थानीय जानकार रीहम के पौधे का उपयोग गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल के उपचार के साथ ही श्वसन, यकृत तथा त्वचा संक्रमण से सम्बन्धित रोगों के उपचार के लिये भी करते हैं।

  • रीहम का सेवन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के साथ ही पीलिया, सिरदर्द, माइग्रेन, लकवा, कटिस्नायुशूल, अस्थमा तथा दस्त के इलाज में भी उपयोगी बतलाया गया है।
  • रीहम का सेवन उच्च कोलेस्ट्रोल स्तर को भी कम करता है।
  • रीहम को गुर्दे की बीमारी के उपचार में भी उपयोगी बतलाया गया है।
  • रीहम की सूखी जडो़ से डीप पीले, पीले लाल रंग की प्राकृतिक डाई भी प्राप्त की जाती है।
  • रीहम को पारंम्परिक चिकित्सा में प्राचीन काल से ही ओषधीय उपयोग में लाया जाता रहा है, इसीलिये इसको “The Lord or King of Herbs” के रूप में भी जाना जाता है।

रीहम यानि आर्चा के औषधीय गुणों का जितना वर्णन किया जाय उतना कम है, फिर भी आप बतलायी गयी जानकारी से सहमत हैं तो, श्वस्थ शरीर के लिये आर्चा एवं आर्चा से निर्मित उत्पादों/ओषधियों का अवश्य सेवन करें।

राज की बात यह है कि रीहम यानि आर्चा के इतने औषधीय गुणों एवं प्राचीन काल से होते आ रहे औषधीय उपयोग की ज्यादा जानकारी मुझे भी नहीं थी। कुछ दिन ही पूर्व संस्थान के फील्ड स्टेशन, तुंगनाथ में कार्यरत फील्ड स्टाफ करण सिंह एवं जगदीश सिंह से कोरोना के ऊपर सम्बन्धित जडी़ बूटियों पर चर्चा करते हुये बतलाया गया कि आर्चा का सेवन भी कोरोना की लडा़यी में लाभकारी हो सकता है। इसी आधार पर जानकारी जुटाते हुये उत्तराखन्ड में उपेक्षित संकटग्रस्त आर्चा के औषधीय गुणों का वर्णन ताजुब करने वाला रहा।

अफसोस इस बात का भी है कि इतनी महत्वपूर्ण एवं संकटग्रस्त प्रजाति का उत्तराखन्ड में अभी तक कृषिकरण ना के बराबर है। संम्भब हो तो उच्च हिमालय के वासिंन्दे आर्चा का ब्यवसायिक उत्पादन कर सभी लोगों को आर्चा उपलब्ध कराने के साथ ही आर्थिक लाभ कमायें। आवश्यकता पड़ने पर बीज पौध एवं कृषि तकनीक हेतु संस्थान (हैप्रेक) से सम्पर्क किया जा सकता है।

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-डा0 विजय कान्त पुरोहित
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