देवभूमि की कुल देवी एवं आराध्य देवी माँ नंदा से उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान -जानिए खबर

श्री नंदा देवी महोत्सव से पर्यावरण संरक्षण

– प्रोफसर ललित तिवारी, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल

नैनीताल। उत्तराखण्ड की कुल देवी, आराध्य देवी माॅ नंदा उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान है। यह धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ मानवीय प्रेम के प्रतीक, हर्ष, उल्लास एवं समाजिक सद्भाव का महोत्सव है। श्री नंदा देवी महोत्सव का प्रारम्भ 17वीं सदी में चंद वंश के राजाओं द्वारा प्रारम्भ किया गया तथा अल्मोड़ा में नंदा देवी मन्दिर बना।

ज्ञातव्य हो कि नैनीताल में 1903 में स्व0 मोती राम शाह जी द्वारा इसे प्रारम्भ किया गया तथा 1918 में स्थापित श्री राम सेवक सभा ने इसकी बागडोर 1926 से ली। उत्तराखण्ड के नैनीताल, अल्मोड़ा, भवाली, रानीखेत, कोट भ्रामरी, चमोली तथा बिन्दुखत्ता में इसका आयोजन प्रतिवर्ष होता है।

नंदा देवी पर्वत, रूपकुण्ड, हेमकुण्ड नंदा देवी के पवित्र तीर्थ स्थल

बता दें कि उत्तराखण्ड में नंदा देवी पर्वत, रूपकुण्ड, हेमकुण्ड नंदा देवी के पवित्र तीर्थ स्थल है। इसे शैलपुत्री नंदा तथा हिमालयी पुत्री भी कहा जाता है। देव भूमि उत्तराखण्ड जहाँ की नदियों का जल गंगासागर तक है तो यहाॅ 65 प्रतिशत वन है तथा 12 प्रतिशत भू-भाग हिमाच्छाादित है यहाॅ की वनस्पतियाँ तथा जीव जन्तु निराले तथा हिमालयी पर्यावरण का महत्वपूर्ण भाग है यहाॅ मोनाल, कस्तूरी मृग के साथ बुरांश एवं ब्रह्मकमल की खूबसूरती दिखती है। इनके साथ नंदा देवी का पूजन पर्यावरण संरक्षण तथा पौधों की विभिन्नता एवं विविधता प्रदर्शित करता है। जन सहभागिता का पर्व है ये तथा विश्व शान्ति हेतु हवन शान्ति का संदेश देतो है जिसमें जड़ी बूटियों का मिश्रण होता है।

माॅ नंदा देवी की मूर्तियों का निर्माण लोक पारम्परिक कलाकारो द्वारा किया जाता है तथा उनकी जीवन्तता जीवन में रंग घोलती है तथा मानवीय संवेदनाओं को प्रदर्शित करते हुए ऊर्जा का संचार करती है। माॅ की मूर्ति निर्माण का आधार कदली का वृक्ष है जिसका वानस्पतिक नाम मूजा पेराडिसिएका तथा कुल मूजेसी है। कदली वृक्ष में माॅ लक्ष्मी का निवास माना जाता है तथा यह पारम्परिक रूप से गलनशील है।

मूर्ति का ढांचा बांस से तैयार किया जाता है जिसका वानस्पतिक नाम बेमबूसा प्रजाति तथा कुल पोऐसी है जो पवित्र है तथा हिन्दु धर्म में इसे जलाना वर्जित है। इसमें कपड़ा तथा रूई का प्रयोग होता है। जो कपास है इसका वानस्पतिक नाम गोसीपियम आरबोरियम तथा कुल मालवेसी है तो आसन पाती, आर्टिमिसिया एनुआ कुल एसटरेसी है जो औषधीय पौधा है।
इसमें लोक पारम्परिक कलाकार प्राकृतिक रंग से जीवन्तता प्रदान करते है तथा नारियल कोकोस नूसीफ¢रा कुल पालमेसी, ककड़ी कुकुमिस सेटाइवा कुल कुकुरबिटेसी प्रिय फल तो प्रिय पुष्प ब्रह्मकमल सोउसूरिया ओबेवेलाटा कुल एसटरेसी है जो उत्तराखण्ड का राज्य पुष्प तथा पवित्र माना गया है एवं औषधीय गुणयुक्त पौधा है।

प्रकृति क¢ विभिन्न अवयवों के मिश्रण से बनी मूर्ति माॅ नंदा सुनंदा उत्तराखण्ड की संस्कृति को जीवंत करती है तथा प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती है कि विशाल हिमालय को बचाना है। इन पर्वत श्रृखंलाओ में अपने मस्तक नंदा देवी चोटी को सतत् विकास के क्रम में संरक्षित रखना है। जिससे पूरी मानव जाति एंव जैव विविधता लाभान्वित हो सके तथा हम बड़े जलवायु संकटों से निपट सके।

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