विश्व स्तर पर कोरोना वायरस के वर्तमान एवं बाद में प्रभाव – जे.सी. चैधरी

नोवेल कोरोना वायरस संक्रमण के कुछ इक्के-दुक्के मामले सबसे पहले चीन में सामने आए और उसके कुछ माह बाद ही देखते-देखते इसने वैष्विक महामारी का रूप धारण कर लिया। इस महामारी के कारण वैष्वीकृत दुनिया की एक दूसरे के साथ मजबूती से जुड़ी हुई प्रणालियां पूरी तरह से बदल गई है। इस वायरस के प्रकोप पर काबू करने के प्रयास के तौर पर अलग-अलग देषों की सरकारों ने आने-जाने तथा सामाजिक मेल-जोल पर बंदिषें लगा दी जिसके कारण दुनिया की 7.8 बिलियन की आबादी में से एक तिहाई से अधिक आबादी इस समय इस महामारी के कारण एक तरह से अपने घरों में बंद रहने को मजबूर है।

कोरोना वायरस की महामारी के कारण वैश्विक स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है और अनेक लोगों के लिए लाॅकडाउन नया ‘नियम’ बन गया है और अब यह धारणा तेजी से बन रही है कि आने वाले समय में जब तक कोरोना वायरस खत्म होगा तब तक दुनिया की सूरत हमेषा-हमेषा के लिए बदल जाएगी।

आज इस बात को लेकर आम सहमति हैै कि अगले डेढ़ से दो साल तक पूरी दुनिया किसी न किसी रूप से संभवतः कोविड-19 के तात्कालिक खतरे से ही जूझती रहेगी और उसके बाद भी पुनर्निर्माण और इसके स्थाई प्रभाव निःसंदेह कई वर्शो तक महसूस किए जाते रहेंगे। दुनिया के कई हिस्सों में, सीमाएं बंद हैं, हवाई अड्डे, होटल और व्यवसाय बंद हैं, और शैक्षणिक संस्थान बंद हैं। ये अभूतपूर्व उपाय कुछ समाजों के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रहे हैं और कई अर्थव्यवस्थाओं को बाधित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां छूट रही है और व्यापक पैमाने पर भूख की छाया बढ़ रही है।

वर्तमान में, कई लोगों को यह पता नहीं है कि यह संकट किस रूप में सामने आएगा। आज की सर्वोच्च प्राथमिकता जीवन बचाना है (जान है तो जान है)। और जीवन बचाने का यह उद्देश्य भविष्य की सफलता है। लेकिन भविष्य में सफल होने के लिए, दुनिया भर के देशों को इसके लिए योजना बनानी चाहिए। हमें आज द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ समझ में आते हैं, लेकिन अगर कोरोना वायरस एक युद्ध है तो उस वायरस से लड़ा नहीं जा सकता और न ही उसे मारा जा सकता है। युद्धकाल के दौरान शत्रु अक्सर अप्रत्याशित होते हैं, लेकिन वे शायद ही कभी अदृश्य होते हैं। फिर भी, किसी युद्ध में अगर विजय हासिल करना हो तो विवेकपूर्ण योजना बनाना जरूरी है।

जैसे-जैसे यह महामारी दुनिया में बंद की स्थिति पैदा कर रही है वैसे-वैसे दो समान पहलू उभर रहे हैं।

(क) पहला तो यह कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है जिसके दो साल तक जारी रहने की संभावना है। जब तक इसकी वैक्सीन विकसित नहीं होगी तब तक यह वायरस एक खतरा बना रहेगा क्योंकि अलग-अलग देष इस वायरस के नए संक्रमणों के चक्र पर काबू पाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे और इस तरह से उनकी स्वास्थ्य प्रणालियांे पर दवाब बना रहेगा। वैक्सीन के विकास, इसके उत्पादन और न्यायसंगत वितरण की बाधाओं को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास की भी आवश्यकता है। गहन चिकित्सा की आवश्यकता वाले तेजी से बढ़ रहे रोगियों का इलाज करने के लिए मास्क से लेकर वेंटिलेटर तक की जरूरी सामानों के उत्पादन एवं उनकी आपूर्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को युद्ध स्तर पर तैयार रखा जाना चाहिए।

(ख) चीन को निर्यात बाजारों के लुप्त होने और आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाहर होने के खतरे का सामना करना पड़ रहा है और वैसे में इस संक्रामक बीमारी के कारण उत्पन्न दूसरे क्रम के प्रभाव वैश्विक वित्तीय बाजारों को तेजी से तबाह कर सकते हैं। कोविड-19 ने न केवल संपत्ति की कीमतों और शेयर बाजारों को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि वास्तविक जीवन और वास्तविक गतिविधियों को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया मंदी की स्थिति में जा चुकी है, अगले साल इस मंदी के पूरा स्वरूप ग्रहण कर लेने की संभावना है। वैष्विक जीडीपी 2021 के लिए अनुमान 2.5 प्रतिषत से नीचे आ गए हैं। जब उत्पादन रुक जाता है, तो यही अपेक्षित परिणाम होता है। व्यवसायिक संचालन को बंद करने के लिए विवष होना पड़ा है जिसके कारण हर जगह उत्पादन में गिरावट हुई है।

कोविड-19 सार्वजनिक सेवाओं सहित सभी सेवाओं की चैथी औद्योगिक क्रांति और डिजिटलाइजेशन को तेजी से आगे बढ़ाएगा। समुदाय और राज्य के बीच संबंधों में पहले की तुलना में अधिक दूरी आएगी और जिसके कारण राज्य सिविल सोसायटी और निजी जीवन पर अपने रिमोट कंट्रोल का विस्तार करेंगे।

विष्व की अर्थव्यवस्थाओं पर कोरोना वायरस का प्रौद्योगिकी आधारित प्रभाव

1. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूती

कोविड-19 के कारण लोगों को घर से काम करने के लिए अपने आप को ढालना पड़ा है। घर में रहते हुए बैठकें करने, षिक्षा हासिल करने, वर्कआउट करने और अन्य काम करने के लिए डिजिटल समाधान खोजने के लिए हम सबको सामूहिक प्रयत्न करने के लिए प्रेरित होना पड़ा है। इस कारण से कोविड-19 के बाद की दुनिया में इन तौर-तरीकों में से कुछ तौर-तरीकों के जारी रहने की संभावनाएं दिख रही है।

2. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित औशधि विकास

जितनी जल्दी हम कोविड-19 के इलाज के लिए प्रभावी और सुरक्षित दवाई तथा कोविड-19 से बचाने वाले टीका का विकास कर लेंगे उतना ही जल्दी इस महामारी पर काबू पाया जा सकेगा। दवाई के विकास में आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस एक आदर्ष सहयोगी साबित होगा। यह मानवीय प्रयासों का पूरक बन सकेगा तथा उन प्रयासों को तेज कर सकेगा। हमारी वर्तमान परिस्थिति ही औशधि विकास में आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस की मदद लेने के भावी प्रयासों के बारे में अवगत कराएगी।

3. टेलीमेडिसिन

अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के कार्यालयों में भीड़भाड़ तथा लोगों की आवाजाही को कम करने के लिए कई हाॅस्पिटल एवं चिकित्सक मरीजों को यह सलाह दे रहे हैं कि वे वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए ही परामर्ष लें। कई तो इसे लागू भी कर रहे हैं। किसी डाॅक्टर के यहां या किसी हेल्थकेयर सेंटर जाने के बजाय रिमोट केयर की मदद से मरीज को क्लिनिकल सेवा प्रदान की जा सकती है। कोविड-19 के पहले कई हेल्थकेयर प्रदाता रिमोट केयर को लेकर दुविधा में थे लेकिन अब जब कई क्षेत्रों में सोषल डिस्टेंसिंग को अनिवार्य बना दिया गया है तब चिकित्सकों में भी इसके प्रति यह दिलचस्पी बढ़ गई है।

4. रोबोटों पर बढ़ी निर्भरता

रोबोट को वायरस का संक्रमण होने का खतरा नहीं होता है। रोबोट का उपयोग किराने का सामान पहुंचाने से लेकर हेल्थकेयर प्रणाली में महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देने तथा किसी फैक्टरी को चलाने जैसे कामों में हो सकता है। कंपनियां अब इस बात को स्वीकार करने लगी हैं कि वर्तमान समय में रोबोट हमारी मदद कर सकते हैं तथा कोविड-19 के बाद की दुनिया में तथा किसी भावी महामारी के दौरान रोबोट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भविश्य में ज्यादा से ज्यादा सरकारें सर्विलेंस (निगरानी) का उपयोग करेंगी। यह वायरस से लड़ने के लिए एक उपयोगी हथियार है – उदाहरण के लिए, भारत और इजराइल जैसे देश वायरसों के समूहों का पता लगाने के लिए यह जानने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं कि किसे और कहां इस वायरस का संक्रमण है। साथ ही साथ ऐसे कदमों से व्यक्ति की निजी आजादी एवं गोपनीयता में कमी आने का भी खतरा है।

चीन इस महामारी का सामना करने वाला पहला देष था और इसलिए उसे इस संकट से काफी लाभ होने का अनुमान है लेकिन इस बात की भी अटकलें चल रही है कि चीन को इस वायरस के प्रकोप की दूसरी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है।

खुदरा खरीददारी अधिक से अधिक ऑनलाइन होगी और ग्राहक सेवा संबंधी संवाद आभासी होगा। सामाजिक दूरी का मतलब कर्मचारियों और ग्राहकों और भागीदारों के बीच आमने-सामने की बातचीत में कमी आना है और ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक संवाद बढ़ेगा। जैसा कि घर से काम करने की प्रवृति बढ़ रही है वैसे में जब यह संकट खत्म हो जाएगा तब नई आदतें विकसित होगी और महामारी के बाद की दुनिया महामारी के पहले की दुनिया से अलग होगी। आमने-सामने की महंगी लागत वाली बातचीत कम होगी लेकिन अपेक्षाकृत कम खर्चीले इलेक्ट्रॉनिक इंटरैक्शन की प्रवृति बढ़ जाएगी।

सोशल मीडिया कंपनियों और समाचार संगठनों की भूमिका इस संबंध में विशेष रूप से काफी महत्वपूर्ण होगी कि हम इस प्रकोप के बारे में कैसे सोचते हैं, खासकर प्लेटफार्मों पर आने वाली गलत सूचनाएं और ‘षड्यंत्र के सिद्धांत’ संबंधी बातों का सामना करने के बारे में।

षिक्षा / सीखने पर आधारित क्षेत्र पर कोरोना वायरस का वैष्विक प्रभाव

1. कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में लाखों लोगों के षिक्षित होने के तरीके में भी परिवर्तन कर दिया है।

39 देशों में घोषित या लागू किए गए लाॅकडाउन के कारण स्कूल बंद हो गए जिसके कारण 421 मिलियन से अधिक बच्चे प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा, अन्य 22 देशों ने आंशिक ‘‘स्थानीयकृत’’ बंदी की भी घोषणा की है।

(क) एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और संयुक्त राज्य अमेरिका में कोरोना वायरस तेजी से फैल रहा है, इन देशों ने पूरी तरह से विकसित हो चुकी महामारी के विकास को कम करने के लिए तेजी से और निर्णायक कार्रवाई की है। पिछले दो हफ्तों में, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में छात्रों की हाजिरी को निलंबित करने के लिए कई घोषणाएँ हुई हैं।

(ख) संकट पर काबू पाने के उद्देष्य से लिए गए इन फैसलों के कारण लाखों छात्रों के लिए अस्थायी तौर पर ’होम स्कूलिंग’ की परिस्थितियां उत्पन्न हो गई, खास तौर पर चीन, दक्षिण कोरिया, इटली और ईरान जैसे देषों में जो कोरोना वायरस के कारण सबसे अधिक प्रभावित देशों में षामिल हैं। इन परिवर्तनों से निश्चित रूप से असुविधा हुई है, लेकिन उन्होंने शैक्षिक नवाचार के नए उदाहरण भी पेष किए हैं।

(ग) वायरस के प्रसार को धीमा करने में मदद करने के लिए, भारत सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में छात्रों ने इंटरैक्टिव ऐप के माध्यम से घर पर रहकर ही पढ़ना और सीखना शुरू कर दिया। अधिकांश को लाइव टेलीविजन प्रसारण के माध्यम से षिक्षण सामग्रियां सुलभ हुई हैं।

(घ) 5 जी तकनीक के चीन, अमेरिका और जापान जैसे देशों में अधिक प्रचलित हो जाने के बाद, शिक्षार्थी और समाधान प्रदाता ’’कहीं भी, कभी भी, किसी भी समय सीखने’’ की डिजिटल शिक्षा की अवधारणा के खास स्वरूपों को अपनाने की दिशा में बढ़ जाएंगे। पारंपरिक इन-पर्सन क्लासरूम लर्निंग के स्थान पर सीखने की नई विधियां स्थान लेंगी – लाइव प्रसारणों से लेकर ‘‘षैक्षिक प्रभावकों’’ तक और वर्चुअल रियलिटी अनुभवों तक। षिक्षण एक ऐसी आदत बन जाएगी जो रोजमर्रे की दिनचर्या- सही जीवनषैली के साथ समायोजित हो जाएगी।

2. षिक्षण संघ एवं गठबंधन विविध हितधारकों के साथ आकार ले सकते हैं – जिसमें सरकार, प्रकाशक, शिक्षा पेशेवर, प्रौद्योगिकी प्रदाता और दूरसंचार नेटवर्क ऑपरेटर शामिल हैं – जो संकट के अस्थायी समाधान के रूप में डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग करने के लिए एक साथ आ रहे हैं। उभरते देशों में जहां शिक्षा मुख्य रूप से सरकार द्वारा प्रदान की गई है, यह भविष्य की शिक्षा के लिए एक प्रचलित और परिणामी प्रवृत्ति बन सकती है।

3. यह महामारी इस अप्रत्याशित दुनिया में छात्रों को सूचित निर्णय लेने, किसी समस्या को रचनात्मक तरीके से हल करने और सबसे महत्वपूर्ण अनुकूलनशीलता जैसे कौषल सीखने की आवश्यकता के प्रति हमारा ध्यान आकर्शित करने के एक मौके के तौर पर भी आई है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि ये कौशल सभी छात्रों के लिए प्राथमिक बने, हमारी शैक्षिक प्रणालियों में लचीलेपन को विकसित किया जाना चाहिए।

भारत की शिक्षा प्रणाली में काफी गड़बड़ियां हैं और छात्र अपने नियमित शैक्षणिक दिनचर्या का पालन करने में असमर्थ रहते हैं। इस आपात स्थिति के मद्देनजर और छात्रों की सुरक्षा और उनकी अकादमिक चिंता को ध्यान में रखते हुए, अधिकांश संस्थानों ने दूरसंचार, स्काइप कॉल, जूम कॉल और अन्य वर्चुअल विकल्पों को सुलभ कराने की पहल की है ताकि शिक्षण के अंतर को पाटा जा सके। यह आभासी कक्षाओं और सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए छात्रों और शिक्षकों को प्रशिक्षण दे रहा है। निस्संदेह, छात्रों के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण समय है। इसलिए, इस कदम का उद्देश्य छात्रों पर दबाव को कम करना और गुणवत्ता के साथ किसी तरह का समझौता किए बिना अपने समय का लाभकारी तरीके से उपयोग करने में मदद करना है।

विश्व अर्थव्यवस्था और व्यवहार्य उपायों पर कोरोना वायरस का आर्थिक प्रभाव

1. व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) के अनुसार गत वर्श वैश्विक विकास 2.9 प्रतिषत था जो वैसे ही बहुत कम था लेकिन इस साल यह 2 प्रतिशत से नीचे गिर सकता है। वैश्विक मंदी अब निश्चित है।

कोविड-19 कोरोना वायरस महामारी के कारण त्रासद मानवीय परिणामों के अलावा, इसने आर्थिक अनिश्चितता को भी बढ़ा दिया है और इसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को 2020 में एक ट्रिलियन डाॅलर का झटका लगेगा। यूएनसीटीएडी का मानना है कि भारत को कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण 348 मिलियन डॉलर का व्यापार घाटा होगा।

कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया भर में लगभग 25 मिलियन नौकरियों पर गाज गिरेगी लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीति की मदद से इस वैष्विक बेरोजगारी के असर को कम करने में मदद मिलेगी।

2. संयुक्त राज्य अमेरिका अविश्वसनीय रूप से चीन पर निर्भर है। बहुत से लोग यह नहीं समझते हैं कि अभी हमारी दुनिया और अर्थव्यवस्था के साथ क्या हो रहा है। अक्सर कंपनियों में, सभी सामानों में से 90 प्रतिशत सामान चीन में तेल से उत्पन्न पदार्थों जैसे प्लास्टिक और पॉलिएस्टर से बनाए जाते हैं। हम जल्द ही देखेंगे कि जूते की अलमारियां खाली हैं, फोन, कपड़े और यहां तक कि टूथपेस्ट नहीं मिलेंगे। हमें चिकित्सकीय सामानों की आपूर्ति में कमी से भी जूझना पड़ सकता है और स्मृति चिन्हों और बेकार गुडी बैग के अंतहीन उत्पादन में रोक लगेगी।

कोविड-19 के कारण विष्व व्यवस्था बदलने वाली है। अगर यह मान लिया जाए कि इस अनिश्चित महामारी की पुनरावृत्ति नहीं होती है, तब भी यह स्पष्ट है कि चीनी सरकार की अधिनायकवाद की नीति और पारदर्शिता की कमी दुनिया को चोट पहुंचाती रहेगी। आज कोविड-19 का संकट खड़ा हुआ है कल उनकी वित्तीय प्रणाली का संकट हो सकता है। यह स्पष्ट है कि लाभ के उद्देष्य से सभी अंडों को एक ही टोकरी में रखने और 80 प्रतिषत आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन में स्थानांतरित करने का विचार अव्यवहारिक है।

भारत में सिंथेटिक साड़ियों के तथा अफ्रीका को प्लास्टिक की घरेलू वस्तुओं के चीन से होने वाले अंतहीन निर्यात ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह से बाधित कर दिया है और पिछले कुछ वर्षों में बहुत अधिक बेरोजगारी (और प्रदूषण) की उत्पत्ति हुई। इस मौजूदा संकट के कारण संभवतः इसमें रोक लगेगी और स्थानीय तौर पर चीजोें को बनाने का नया अवसर पैदा होगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप को मौजूदा वक्त को जागने की घंटी के तौर पर लेना होगा और उन्हें गैर-सैन्य संबंधी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों को दूर करने के लिए अधिक ध्यान देना होगा जिसमें आवष्यक आपूर्ति श्रृंखला के लिए चीन पर बहुत अधिक निर्भरता भी शामिल है जिसमें फार्मास्यूटिकल्स से लेकर हाई टेक गियर में उपयोग होने वाले ‘‘रेयर अर्थ’’ सामग्रियां भी आती हैं। अमरीका में बेची जाने वाली करीब 80 प्रतिषत दवाइयों का उत्पादन चीन में किया जाता है। चीन कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के सक्रिय संघटकों के लिए सबसे बड़ा और कई मामलों में एकमात्र वैश्विक आपूर्तिकर्ता भी है।

3. घातक वायरल के प्रकोप को सीमित करने के चीन के प्रयासों ने उन कारखानों को अपंग कर दिया है जो कारों और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर कपड़े और ग्रीटिंग कार्ड तक सब कुछ बनाते हैं। इसके परिणामस्वरूप इस संकट ने हमें इस बात का स्मरण कराया है कि यह विष्व घटकों तथा तैयार उत्पादों के स्रोत के रूप में किस हद तक चीन पर निर्भर है।

देशों को देश के रोजमर्रा के जीवन को चलाने के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण चीजों और दवाइयों का स्वदेषी तौर पर उत्पादन षुरू करने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इस संदर्भ में, भारत एक अधिक गतिशील और टिकाऊ दुनिया बनाने में मदद करने के लिए बहुत अच्छी स्थिति में है। सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, जैव प्रौद्योगिकी, और चिकित्सा पर्यटन क्षेत्रों सहित अनेक सेवा क्षेत्रों में भारत प्रतिस्पर्धात्मक लाभ की स्थिति में है।

भारत में बड़े पैमाने पर विकास की संभावना है। सिर्फ 35 साल पहले, भारतीय और चीनी अर्थव्यवस्था का निर्यात एकसमान था। बाजार के अनुकूल व्यापक सुधार के कारण इन वर्शों में चीनी अर्थव्यवस्था में काफी बड़े पैमाने पर विकास हुआ।

जिन चारों देषों को कोरोना वायरस की सबसे गहरी मार पड़ी उनमें ईरान भी षामिल है जहां अब तक संक्रमण के 4,700 मामले सामने आए हैं तथा 124 लोगों की मौत हुई है। ईरान बढ़ती अविश्वासी आबादी के बीच इसके प्रसार को रोकने के उपायों से जूझ रहा है। इसने परमाणु हथियार की दिषा में यूरेनियम संवर्धन में तेजी लाने के लिए कदम उठाए हैं। ईरान अपने दुर्भावनापूर्ण क्षेत्रीय व्यवहार को तेजी से कम करने का विकल्प चुन सकता है जिसके कारण उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है और जो न तो वहां के नागरिकों और न ही उसके पड़ोसी देषों के लिए हितकारी है। वह हथियार बनाने वाली सामग्रियों के लिए यूरेनियम संवर्धन को बढ़ाने के हाल के कदम को वापस खींच सकता है।

दुनिया के 10 सबसे बड़े बंदरगाहों में से सात चीन में हैं। चीन को दुनिया का उत्पादक बनाने की दृश्टि से इन बंदरगाहों को तैयार किया गया था। इन्हें दुनिया का आयातक बनने के लिए नहीं बनाया गया था। चीन में 1.3 बिलियन लोग हैं जिनके लिए भोजन एवं आवास की जरूरत है।

अगर इस महामारी ने हमें कुछ सिखाया है, तो वह यह है कि चीन पर अत्यधिक निर्भरता को काफी हद तक कम करने की जरूरत है। यह सोच दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से विकसित हो रही है।

4. वायरस के प्रकोप ने सरकारों के हाथों में जबरदस्त शक्ति और जिम्मेदारी डाल दी है। यह एक ऐसी समस्या नहीं है जिससे नीचे से ऊपर तक निपटा जा सकता है, लेकिन सरकार से विशिष्ट मार्गदर्शन, आदेश और विनियमन की आवश्यकता है। इस संकट का समाधान केंद्रीय रूप से संचालित होगा। सरकारों को लंबा रास्ता तय करना है।

(क) सबसे पहले, दुनिया भर में ब्याज दर को तबतक कम रखे जाने के लिए ठोस प्रयास किए जाने की आवश्यक है जब तक कि आर्थिक गतिविधियां पुनर्जीवित नहीं हो जाती जो वस्तुओं और सेवाओं की मांग में तेजी आने के साथ गति पकड़ेगी और परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्थाएं पुनर्जीवित हांेगी।

(ख) दूसरे, जब सरकार लोगों को घर के अंदर रहने और काम पर नहीं जाने के लिए कह रही है, तो जो लोग अपनी आमदनी खो चुके हैं उन्हें मदद करने की जिम्मेदारी बहुत ही अधिक और वास्तविक है। ऐसे लाखों दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी हैं, जो बंदी के कारण रोजगार से बंचित हो गए हैं। व्यापक रूप से हुई छंटनी, वेतन में कटौती आदि बेरोजगारी ही पैदा करेगी। चूकि कर संग्रह में भी कमी आएगी और ऐसे में सरकार को इन लोगों की मदद करने और काफी अधिक कर्ज लेने के लिए संसाधनों की तलाष करनी होगी।

अर्थव्यवस्था के अन्य चालक – निजी खपत, निवेश की मांग, निर्यात वृद्धि – सभी धीमे हो जाएंगे और इनके पुनर्जीवित होने में समय लगेगा। सरकारी व्यय के बिना, मंदी का प्रभाव गहरा होगा।

(ग) तीसरी बात यह कि, वैष्विक सुधार के लिए अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग के बारे में काम करना होगा। अर्थव्यवस्थाएं विकास के लिए विश्व व्यापार पर निर्भर रहती है और इन्हें दोबारा अपनी स्थिति में वापस लौटने में अधिक समय लगेगा। आर्थिक गतिविधियां असमान रहेंगी और इसका मतलब यह होगा कि जब चीन और दक्षिण कोरिया उत्पादन षुरू करने के लिए तैयार हो रहे हैं, वैसे में ब्रिटेन और अमेरिका में कम खपत और बंद की स्थिति पैदा हो रही है। इनकी तुलना में भारत तुलनात्मक रूप से भाग्यशाली साबित हो सकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर, यह महामारी कई देशों को अपनी सामाजिक नीतियों, विशेष रूप से सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य देखभाल पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगी। इसके अलावा, अनौपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों की मदद करने के प्रयास होंगे।

5. रक्षा और सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य अब एक रणनीतिक मुद्दा है। दुनिया में लंबे समय से सैन्य षक्ति हासिल करने एवं विनाषकारी हथियारों को महत्व देने वाली ताकत हासिल करने के लिए नई तकनीकों एवं प्रयोगों पर काफी मात्रा में धन खर्च किया जाता रहा है। जो देष हथियार एवं अस्त्र-षस्त्र हासिल करने के लिए अधिक धन खर्च करते रहे हैं वे दुनिया में सबसे अधिक प्रभावषाली एवं षक्तिषाली देषों में षामिल हो गए हैं।

पिछले चैदह वर्षों में, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने सैन्य अभियानों के लिए 1.5 ट्रिलियन डाॅलर खर्च किए, स्वदेशी सुरक्षा बलों के लिए 92 बिलियन डाॅलर तथा राज्य और विदेशी सहायता के लिए 92 बिलियन डाॅलर एवं अन्य सेवाओं के लिए 5 बिलियन डाॅलर खर्च किए हैं।

दुनिया की बदलती गतिशीलता के कारण युद्ध के तौर -तरीकों में भी बदलाव आएगा और ये परम्परात रूपों के बजाए अन्य रूप हासिल करेंगे जैसे जैव युद्ध, हाइब्रिड युद्ध और साइबर युद्ध आदि। कुछ लोग मानते हैं कि कोरोना वायरस एक प्रयोगषाला में बनाया गया रोगाणु है जो गलती से एक चीनी प्रयोगशाला से बाहर आ गया। अन्य लोगों का कहना है कि यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना अर्थात संयुक्त राज्य अमेरिका की करतूत है, जिसने धरती के सर्वाधिक आबादी वाले देश में इसे फैलाया ताकि नए जैव हथियार के लिए आधार तैयार किया जा सके। एक वैकल्पिक मान्यता यह है कि चीन ने अपने प्रतिद्वंद्वियों की औद्योगिक और आर्थिक क्षमता को नुकसान पहुंचाते हुए खुद को सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए जानबूझकर जैविक हमला किया है।

हर जगह की जैविक-युद्ध प्रयोगशालाएं गंभीर खतरों का एक स्रोत रही हैं, बड़ी शक्तियों ने व्यापक विनाश के हथियारों के रूप में इस्तेमाल करने के लिए इन्हें बढाया है। इसका सबूत यह है कि दुनिया भर में ऐसी कई प्रयोगषालाएं हैं।विष्व का आकलन केवल इस बात से नहीं किया जाएगा कि वुहान वायरस से कितने लोगों की जानें गई बल्कि इस बात से भी किया जाएगा कि संकट के बाद शासन, संकट प्रबंधन और एक लोकतांत्रिक प्रणाली कैसे तैयार होती है।

रोगाणुओं को युद्ध के जिन्न की बोतल से बाहर निकालने के बाद, बड़ी शक्तियों में से कोई भी अब जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकती। कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य को मदद देने के लिए वैष्विक कोश की स्थापना तथा सहयोगी देषों की स्वच्छता संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए वित्तीय मदद दिया जाना सही दिशा में कदम होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत आयोग और थिंकटैंक टीमों की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें गैर-राजनीतिक सदस्यों और वैज्ञानिकों को शामिल किया जाए। यह आयोग कोरोना वायरस के प्रकोप के खिलाफ त्वरित कार्रवाईयों का समन्वय कर सकता है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्रं को सुदृढ़ करेगा और वायरस के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को कम करेगा।

कोरोना वायरस का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

1. संपर्क रहित इंटरफेस और इंटरैक्शन

होटल, रेस्तरां और हवाई जहाज सहित पारंपरिक एनालॉग व्यवसाय के संकटग्रस्त होने के कारण भौतिक एनालॉग विष्व खत्म हो रहा है। हालांकि इस महामारी के समय प्रौद्योगिकी की मदद से डिजिटल विष्व तेजी से उभर रहा है। हर कोई घर में बैठा है, और दुनिया के साथ उनके संपर्क का माध्यम स्मार्टफोन बन गया है। महामारी के बाद उभरने वाली दुनिया में आज की तरह हर जगह प्रौद्योगिकी होगी और तकनीकी कंपनियां और भी अधिक शक्तिशाली बन जाएंगी और उनका अधिक वर्चस्व होगा। इसमें जूम जैसी छोटी फर्में और गूगल, एप्पल, फेसबुक और पेपाॅल जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। यह बहुत पहले की बात नहीं है जब हम सभी टच स्क्रीन से प्रभावित थे और उसकी मदद से हम काम करने में सक्षम थे। कोविड-19 ने हममें से ज्यादातर को उन सभी स्पर्ष की जाने वाली (टचेबल) सतहों के प्रति अति-संवेदनषील बना दिया है जो संक्रमण को फैला सकती है इसलिए कोविड-19 के बाद की दुनिया में, इस बात का अनुमान है कि हमारे पास कम टच स्क्रीन होंगे और अधिक से अधिक वॉयस इंटरफेस और मशीन विजन इंटरफेस होंगे।

2. व्यक्ति खतरनाक बन गए हैं।

इस बड़े पैमाने का संकट समाज को नाटकीय तरीके से, बेहतर या बदतर बना सकता है। और यह होगा।
कोरोना वायरस की महामारी स्थायी तरीकों से समाज को नयी आकृति प्रदान करेगी और लोगों के यात्रा करने, घर खरीदने, सुरक्षा एवं निगरानी तथा यहां तक कि भाशा के प्रयोग के तौर-तरीकों के बारे में बदलाव आएगा।

हम सबको अपने-अपने घरों में बंद रखने वाला यह वायरस जो सरकार के साथ, बाहर की दुनिया के साथ और यहां तक कि एक दूसरे के साथ हमारे संबंधों को बदल रहा है हो सकता है कि यह महीनों तक रहे। आने वाले महीनों और सालों के दौरान हम जो परिवर्तन महसूस करेंगे उनसे हम अपरिचित हो सकते हैं और ये परिवर्तन हमारे लिए मुष्किल हो सकते हैं। क्या विभिन्न देष बंद रहेंगे? क्या स्पर्श वर्जित हो जाएगा? रेस्तरांओं और यात्राओं का क्या होगा? स्वास्थ्य क्लबों में किस व्यवहार का प्रदर्शन किया जाएगा? वैसे रेस्तरां स्थाई तौर पर बंद हो सकते हैं जहां लोग बैठकर खाना खाते हैं क्योंकि वहां कम संख्या में लोग जाएंगे। यह संभव है कि दुनिया भर में ऐसे रेस्तरां कम हो जाएं।

हम जानते हैं कि विभिन्न चीजों को छूना, अन्य लोगों से मिलना-जुलना और बंद जगह की हवा में सांस लेना खतरनाक हो सकता है। हाथ मिलाने या हमारे चेहरे को छूने से हम परहेज करने लग सकते हैं और बार-बार हाथ धोने की प्रवृति विकसित हो सकती है। अन्य लोगों की उपस्थिति के कारण हमें जो राहत या आनंद का अहसास होता था अब हो सकता है कि लोगों के आसपास नहीं होने से हमें अधिक राहत मिले, खास कर वैसे लोगों से जिन्हें हम नहीं जानते हैं। लोग भीड़ पर अविश्वास करेंगे। सामाजिक मेल-मिलाप सीमित होंगंे और आने वाले समय में हम कार्यस्थल पर, स्कूलों में और सार्वजनिक जगहों पर किस तरह व्यवहार करेंगे और यहां तक कि बच्चे मिलकर कैसे खेलेंगे यह आने वाले समय में अलग होगा। कोरोना वायरस के कारण सामाजिक तानेबाने में जो दरारें आएगी उन्हें दूर नहीं किया जा सकेगा।

ऐसे कई सवाल होंगे, जैसे कि आने वाले समय में हमें क्या हाथ मिलाने चाहिए, क्या हम कहीं सुरक्षित यात्रा कर सकेंगे या क्या हम छुट्टियां मनाने जा सकेंगे और क्या महामारी के खत्म होने के बाद घर में बनाए गए आॅफिस सेटअप को खत्म कर देंगे।

3. बहुत से लोग जब पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएंगे कि उनके जीवन की कई चीजें बदल गईं।

हमारे जीवन में बहुत कुछ आदतन है और हमारी ये आदतें हमें काम करने में, हमारे परिवार की देखभाल करने में और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में काफी प्रभावी तरीके से मदद करती हैं। इस व्यवस्था को जब झटका लगता है तो हमारी आदतें बदलती हैं। लोगों के काम करने एवं आने-जाने के तौर-तरीके बदल जाते हैं, उनकी रोजमर्रे की दिनचर्या और उनके जीवन की लय बदल जाती है। उनके खाने-पीने और अपने परिवार के साथ संवाद करने के तरीके बदल जाते हैं। जब लोग चीजों को अलग तरीके से करने को मजबूर होते हैं तो नई आदतें जन्म लेने लगती हैं।

4. जीवन का एक और पहलू जो इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित हुआ है वह है संस्कृति, खास तौर पर धर्म। महामारी ने विभिन्न तरीकों से धर्म को प्रभावित किया है और मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च जैसे विभिन्न धर्मों से जुड़े पूजा के स्थल बंद हो गए तथा विभिन्न त्यौहारों एवं पर्वो से जुड़ी तीर्थयात्राओं पर रोक लग गई।

दक्षिण कोरिया, ईरान और मलेशिया जैसे कुछ देशों में, कोविड-19 मामलों की वृद्धि को धार्मिक स्थलों के साथ जोड़ा गया जबकि भारत में इसके लिए धार्मिक जमावड़े को जिम्मेदार ठहराया गया।

यह महामारी किसी युद्ध से अलग है लेकिन इस पर विजय के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है। जब लोगों को अहसास होगा कि सामूहिक कार्रवाई से क्या हासिल हो सकता है तब इस बात में बदलाव आ सकता है कि हम कैसे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और इसका परिणाम यह होगा कि समुदाय की एक व्यापक भावना पैदा होगी। हमें यह सुनिष्चित करना है कि इस महामारी के लिए जो बदलाव हो वह बेहतरी के लिए हो न कि बदतर हालात के लिए। कोविड-19 महामारी ने दुनिया को काफी हद तक बदल दिया है। हर दिन जैसे-जैसे इसका प्रसार बढ़ रहा है वैसे-वैसे यह अधिक स्पश्ट होता जा रहा है कि इसने कैसे दुनिया को बदला है। जब हम इससे उबरेंगे, हम निष्चित ही अलग दुनिया में अलग लोग होंगे।

(लेखक एक प्रसिद्ध उद्यमी, प्रेरक वक्ता और अंकशास्त्री हैं)

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