व्यंग्य: बड़भागी पकौड़न

ललित शौर्य, प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद

पकौड़ी को सुख-दुख में साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त है। पकौड़ी को पकौड़न भा गया है। पकौड़न सम्मान सूचक है, आध्यात्मिक है। पकौड़ा, पकौड़ी का हमसफर है। लेकिन जो ख्याति, प्रसिद्धि पकौड़ी को प्राप्त है वो अब तक पकौड़ा प्राप्त नहीँ कर पाया है। पकौड़ी इन दिन सुर्खियो में है। देश की संसद से लेकर सड़कों तक पकौड़ी-पकौड़ी की आवाज सुनाई दे रही है। जो नेताजी कल तक घर में घर की नेताइन की डर से पकौड़ी तला करते थे वो आज खुलेआम सड़कों पर पकौड़ी तल रहे हैं। और पकौड़ी तल कर विरोध दर्ज कर रहे है।

पकौड़ी तलना बुरा काम नहीं है और पकौड़ी तलना साधारण काम भी नही है। पकौड़ी तल कर के लोग वर्ल्ड टूर पर भी गए हैं। पकौड़ी तलकर बड़े-बड़े बिजनस स्थापित कर चुके हैं। पकौड़ी और पकौड़ी वाले को हीन भावना से नहीँ देखना चाहिए। घर पर जब घरवाली पकौड़ी तलती है तो नमक कम होने पर भी उसकी तारीफों के पुल बाधे जाते हैं या बाधने पड़ते हैं। पकौड़ी मूड फ्रेश कर देती है। पकौड़ी भूख मिटा देती है। पहले प्यार की पहली शुरुवात पकौड़ी से की जा सकती है। दो देशों के बीच जब बातचीत होती है तो टेबल पर पकौड़ियाँ सजी होती हैं। साजन जब पहली बार सजनी को देखने उसके घर पर पहुचते हैं तो सजनी बड़े प्यार से प्लेटो में चटपटी पकौड़िया सजा कर लाती है।सभी जगह स्वागत के लिए ज्यादातर पकौड़ियाँ रखी जाती हैं।

पकौड़ियाँ हमारे समाज में रची बसी हैं। पकौड़ियों से हमारा बहुत गहरा सम्बन्ध हैं। पकौड़ियों को भारतीय समाज से अलग कर के नहीँ देखा जा सकता है। हर आदमी के भीतर एक पकौड़ी मेन छिपा हुवा है। कभी ना कभी वो पकौड़ी मैन बाहर निकलता है। पकौड़ी इतनी सीधी सरल है कि उसे कोई भी तल सकता है। पकौड़ी के लिए बहुत बड़ी रेसिपी की जरूत नहीँ पड़ती है।पकौड़ी के लिए हो हल्ला चिल्ल पौं मचाने की जरूरत नही है, क्योकिं पकौड़ियाँ हमेशा से शांति दूत साबित हुई हैं। मुद्दे कई और भी हैं। उन्हें उछालिए। बेचारी पकौड़ी को राजनीति में ना घसीटिये। पकौड़ी तो मेल कराती आई है। प्याज का बेसन से, नमक से, मसालों से, अन्य सब्जियों से और अंत में गर्म तेल से।

अपना जी जलाकर भी हम सबको आनंद देती है। पकौड़ी की महिमा अनंत है। कोई दार्शनिक ही पकौड़ी के महत्व को समझ सकता है। पकौड़ी महान है। पकौड़ी जैसा कोई नहीं। राजनीति के लिए पकौड़ी की महानता की हत्या करना पाप है। पकौड़ी को प्लेटों में रहने दीजिये।उसे राजनीति के दरबारों में मत खींचिये। राजनीतिक नाकें हर जगह वोटों की खुसबों सूंघ लेती है। पर पकौड़ी की खुसबू के आगे सब तरह की सुगन्ध फीकी हैं। आइये पकौड़ीयां तलते हैं। देश बदलते हैं।

Sushil Kumar Josh

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