सात फेरे, सात जन्म या प्रेम पर्व के सात दिन

व्यंग्यः सात फेरे, सात जन्म या प्रेम पर्व के सात दिन

आपको तो पता ही है दोस्तों, जमाना बदल रहा है और जीवन के प्रत्येक पहलुओं में परिवर्तन आ रहे हैं। एक जमाना था, जब चिट्ठियां आती-जातीं थीं और उनका जवाब आने में महीने-दो महीने तक लग जाते थे। जिसके बाद कुछ विकास हुआ और दूरभाष की सुविधा लोगों तक पहुंची, जिससे कि लोग अपने रिश्तेदारों से बातचीत कर लेते थे।

जिसके लिये लोगों को पब्लिक काॅल आॅफिस (पी.सी.ओ) जाना पड़ता था और एरिया के हिसाब से बातचीत का खर्चा देना पड़ता था। कुछ समय के बाद मोबाईल फोन ने दस्तक दी, लेकिन खर्चा भी साथ था।

मोबाईल के शुरूआती दौर में आप किसी को फोन करो या कोई आपको फोन करे तो धनराशि मोबाईल से देनी ही पड़ती थी। लेकिन वर्तमान में अब मोबाईल से बात करना बेहद सुखद और सस्ता हो चुका है।

बदलते समय और बदलते जमाने के साथ-साथ मोबाईल की सेवाओं में कई परिवर्तन आये। तकनीक ने अपना खम्भा सोशल मीडिया में गाड़ दिया और यह भी मोबाईल में कैप्चर हो गया। जहां कभी चिट्ठी, तार, दूरभाष आदि से बातचीत हुआ करती थी। अब वहीं वट्स एप में वीडियो कालिंग और संदेशों का ढेर लगा रहता है।

विकास तो देखो३ घर में कोई जी रहा हो या मर रहा हो, जन्म दिन हो या शादी की सालगिरह, किसी को प्यार हो जाय या दिल टूट जाय तो फेसबुक पर पोस्ट कर दो। नहीं तो ट्विटर पर ट्वीट मार दो और वट्स एप के समूहों में साझा कर लो। खैर सोशल मीडिया बहुत हैं, कहीं भी झक मार लो। लेकिन इतना भी है कि सोशल मीडिया से लाभ भी बहुत है और विकास भी हुआ है।

बहरहाल, विकास की बात को पूरा करना भी जरूरी है, क्योंकि आगे आने वाले समय में कुछ नया भी हो सकता है। विकास ने तकनीक में तो अपना प्रभाव डाला ही है, लेकिन विकास होने से त्यौहार मनाने के तरीके, खाने-पीने के तरीके, कपड़े पहनने के तरीके, रिश्ते बनाने और निभाने के तरीकों में भी बदलाव आया है।

अब मेरे मस्तिष्क में दो सवाल अभी बचे हुये हैं। पहला यह कि क्या हिन्दुस्तान का नववर्ष कब शुरू होता है और कब मनाया जाता है? दूसरा सवाल यह कि भारत में कोई ऐसा शख्स जो वेलेंटाईन-डे को नहीं जानता हो? खैर, पहले सवाल को छोड़ो, क्योंकि चैत्र-बैशाख को आजकल के ज्यादातर युवा जानते नहीं।

अधिकतर युवाओं के हिन्दुस्तानी महीनों के नाम पर मुंह बंद रहता है। इनका नया साल 31 दिसम्बर की रात को दारू-चिकन की पार्टी और 01 जनवरी की सुबह सिर पकड़कर बिस्तर से उठते हुये होता है।

वहीं, लगभग सभी को राष्ट्रीय दिवसों और पर्वों की भी जानकारी रहती है। जो सोशल मीडिया में छाये रहते हैं और लिखा होता है कि ‘‘आप सभी देश और प्रदेशवासियों को अलना दिवस-फलाना दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।’’

बहरहाल, समय के साथ-साथ बहुत बदलाव आ रहे हैं और आगे भी आयेंगे। अब अपना ध्यान मुख्य बिन्दु पर केन्द्रित करें तो कौन है ऐसा व्यक्ति जो 07 से 14 फरवरी का समय भूल जाये। कौन ये भूल सकता है कि

07 फरवरी को गुलाब का फूल देना है, 08 फरवरी को प्यार का इजहार करना है, 09 फरवरी को चाॅकलेट खिलानी है, 10 फरवरी को एक गुड्डा देना है, 11 फरवरी को वादा करना है, 12 फरवरी को गले लगाना है, 13 फरवरी चुम्मी देनी है और 14 फरवरी क्या करना है यह तो मुझे भी नहीं पता, क्योंकि उस दिन वेलेंटाईन-डे का पर्व आता है। पर्व है तो शादय इस दिन प्रेमी-प्रेमिका की पूजा करने का रिवाज हो।

बहरहाल, इस साप्ताहिक पर्व में दुकानदारों की कमाई, प्रेमिका की घुमाई और प्रेमी की जेब की खिंचाई होती है। यही है वेलेंटाईन-डे का सुरूर कि कोई भी बार, रेस्टोरेंट, बाग-बगीचे, होटल, पार्क और दुकानें इन दिनों खाली नहीं रहती। कहीं ऐसा न हो कि कुछ समय बाद इसे भी एक राष्ट्रीय पर्व न घोषित कर दिया जाय।

वैसे भी पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का हमारे देश में बोलबाला है। अब आप ही सोचिये, अगर ऐसा हो गया तो फिर क्या होगा। कुछ नया नहीं होगा, सात दिन की सरकारी छुट्टी होगी।

सोशल मीडिया में एक संदेश घूमता हुआ नजर आएगा कि ‘‘आप सभी देश और प्रदेशवासियों को एवं प्रेम करने वाले दम्पतियों को रोज दिवस, प्रपोज दिवस, चाॅकलेट दिवस, टैडी दिवस, प्रोमिस दिवस, हग दिवस, किस दिवस तथा वेलेंटाईन दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।’’

आश्चर्य की बात नहीं है, क्या पता सरकार इन सात दिवसों का राष्ट्रीय अवकाश न घोषित कर दे।

राज शेखर भट्ट, देहरादून

Sushil Kumar Josh

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