यहां खुली डॉक्टर्स-इंजीनियर बनने की दुकान; छुट्टा दावा बनाये जाते है डाक्टर्स-इंजीनियरः

व्यंग्य: विज्ञापनी सम्मोहन

Lalit-Sauriya
इं. ललित शौर्य
प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उत्तराखंड

विज्ञापन में भयंकर वाला सम्मोहन होता है। जो एक बार विज्ञापन के जाल में फँस पड़ता है, फिर वो पकोड़े की तरह तला जाता है। उसकी जेब का सरेबाजार चीरहरण होता है। फिर भी वो मुस्कुराते हुए लुटता है। विज्ञापन मीठी छुरी है। जो बड़े प्यार से अगले को खसोटती है।

वहीं आज घर-घर विज्ञापन की पैठ हो चुकी है। आदमी ने विज्ञापन को विश्वनीयता का पैमाना बना डाला है। वही चीज महान है, उम्दा और भरोसे लायक है जिसका विज्ञापन चल रहा है। विज्ञापन विहीन वस्तुओं का इस बाजारी युग में कोई अस्तित्व नहीँ है। शहर विज्ञापनों से सजे पड़े हैं। तरह-तरह के विज्ञापन तैर रहे हैं। विज्ञापन लोगों के जेब में है, हाथ में है, मोबाइल में है। आज मोबाइल बात करने का साधन कम मल्टीनेशनल कम्पनियों की बात (प्रचार) करने का साधन ज्यादा बन चुका है। वो चीख-चीख कर वस्तुओं का प्रचार कर रहा है। जिसका प्रचार होता है वही प्रचलन में रहता है। बाकी सब बाजार से गायब, ठीक उसी तरह जिस तरह दूध में से मख्खी। आज हर बंदा प्रचार में जुटा है। हर क्षेत्र में प्रचार है।

शिक्षा विज्ञापनों से बिक रही है। बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स इस बात का छुट्टा दावा कर रही हैं कि यहां पर इंजीनियर और डाक्टर्स बनाये जाते हैं। डॉक्टर्स और इंजीनियर बनने की दुकानें खुल चुकी हैं, जिनके विज्ञापन अखबारों और टी.बी चैनलों में भी धड़ल्ले से देखे जा सकते हैं। अब नेता भी विज्ञापन से चमकाएं जाते हैं। विज्ञापनी नेता चुनाव में टिकें या न टिक पाएं अखबारों और होर्डिंग्स में चेहरे पर विज्ञापनी मुस्कान टिकाये देखे जा सकते हैं। चुनाव के समय सरकार विज्ञापन द्वारा ही दिखाती है कि उसने पाँच सालों में कितना विकास किया है। विकास भले ही धरातल पर ना दिखे पर वो विज्ञापनों में खूब फलता-फूलता हुवा दिखाई देता है।

विज्ञापन का सम्मोहन ही है कि रंग से सावले या काले लोगों का वर्षों से क्रीम लगाने के बाद भी क्रीम से विस्वास नहीँ टूटता। हर बार नई क्रीम का विज्ञापन उन्हें अपने जाल में फंसा डालता है। और वो पूरे आत्मविश्वास के साथ क्रीम की कृपा की प्रतीक्षा करने में लगे रहते हैं। विज्ञापन हर जगह है। बच्चे पैदा होते ही टी.बी. विज्ञापन में दिखाई जाने वाली चॉकलेट की डिमांड करने लगते हैं। विज्ञापन का नशा हमारे रगो में दौड़ने लगा है। हम गर्व के साथ विज्ञापनी होते जा रहे हैं।

अगर कोई बंदा बाजार से कोई चीज खरीद के ले आता है, और घर आने पर जब पता चलता है कि इस चीज का तो विज्ञापन आता ही नहीँ तो पत्नी उसे डपटते हुए वापिस बाजार भेज देती है। डरा-सहमा पति सामान वापस करने चला जाता है। ये विज्ञापन का भौकाल है। आजकल बिना विज्ञापन वाली चीनी और चाय तक नहीँ खरीदी जाती। विज्ञापन से सने हुए अंडर गारमेंट्स ही पहने जाते हैं। इस विज्ञापनी दौर में साहित्य भी विज्ञापनों की जकड़ में आ चुका है, और साहित्यकार भी। जिसका जितना प्रचार वो उतना महान। बड़े मंचों से विज्ञापन और सम्मान दोनों ही आवश्यक हैं, अन्यथा आपका लेखन कलम घसीटी घोषित हो जायेगा। विज्ञापनी माहौल में जिंदा रहने के लिए हम सबको अपने चेहरे में विज्ञापनी मुस्कान टाँगनी ही पड़ेगी। अन्यथा यहां आपको कोई सीरियसली लेना वाला नहीँ है।

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