असंतुलित विकास के कारण ग्रामीणों एवं गरीब तबके का पलायन शहरों की ओर… -जानिए खबर

राष्ट्रहित में ठोस निर्णय लिए जाने के सन्दर्भ में पुष्पेश त्रिपाठी ने पीएम मोदी को लिखा पत्र

देहरादून। उक्रांद एक राजनैतिक दल के रूप में जनता की ओर से पीएम मोदी को राष्ट्रहित में ठोस निर्णय लिए जाने के सन्दर्भ में व असंतुलित विकास के कारण ग्रामीणों एवं गरीब तबके का पलायन शहरों की ओर के संबंध में पुष्पेश त्रिपाठी ने कुछ सुझाव लिखे है जिससे देश के हर व्यक्ति का विकास हो सके और पलायन की मार झेल रहे गांव में पुनः फिर खुशाहाली छाये। वहां के गरीब, असहाय व मजदूर को अपनी आर्थिकी चलाने के लिए काम-धाम घर ही मिल सके और गांव व कस्बों के फिर से जिन्दगी खुशाहल हो सकेगी।

सेवा में,
         माननीय प्रधानमंत्री जी,
         भारत सरकार, नई दिल्ली

विषय : राष्ट्रहित में निम्नांकित ठोस निर्णय लिए जाने के सन्दर्भ में,

मान्यवर,
कोरोना महामारी एक आपदा की तरह आयी है, परन्तु इस समय के हालातों से सीख लेकर एक नयी शुरुआत की जा सकती है!
राज्य और केंद्र सरकारें लॉक डाउन एग्जिट के बाद इन मुद्दों पर ठोस कदम उठायें तो भविष्य की चुनौतियों को सही तरह से संभाला जा सकता है! और सबसे बड़ी जरूरत है कि सरकारी व्यवस्थाएं प्रतिक्रियावादी होने की बजाय समय पर और सटीक निर्णय लें! साथ ही  मानवीय व्यवस्था की जरूरत है कि वह समय से जिम्मेदारी के साथ समस्याओं से निपटे!
मान्यवर,

 कुछ सुझाव हैं, और उक्रांद एक राजनैतिक दल के रूप में जनता की ओर से इन सुझावों पर अमल किये जाने की उपेक्षा रखता है!
1) कोरोना से एक तरह से हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का क्रिटिकल आकलन होता है! अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं ना होना, डॉक्टर्स और प्रक्षिशित नर्सेज और हेल्थ केयर एक्सपर्ट की कमी, लैब डायग्नोसिस सेंटर की कमियां इत्यादि!  इन सभी कमियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जाएं, संगठित रूप से वैज्ञानिक शोध की जरूरतों पर ध्यान दिया जाये और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए स्वास्थ्य के उच्चतम और सामान मानक सभी जगह लागू हों!

2) देश भर में सबसे ज्यादा प्रभाव मजदूरों पर पड़ा है! उनकी हालत किसी से नहीं छिपी है, इन असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए ठोस एवं कारगर उपाय मसलन पेंशन, रोजगार ना होने पर भत्ते की व्यवस्था, दैनिक वेतन की बढ़ोत्तरी और आवास की व्यवस्था जैसे समाधान तत्काल लागू किये जाने की आवश्यकता है!साथ ही एकमात्र योजना मनरेगा की कमियों को प्राथमिकता के साथ दूर करने की भी जरूरत है! (i) मजदूरी बढ़ाना (ii) समय पर मजदूरी दिया जाना (iii) मनरेगा कर्मियों को राज्य कर्मी घोषित करना आदि!

3) यूँ तो सरकार लोगों तक जानकारियां पहुँचाने के लिए कई तरह के मोबाइल ऍप्स लॉन्च करती रहती है, ऐसी  ही कोई ऐप्प या एसएम्एस व्यवस्था गरीबों और मजदूरों के लिए भी बनाईजाये,  जिसको भी भोजन या अन्य कोई समस्या हो वह एप्प्स या एसएम्एस से अपने नाम पते से स्थानीय प्रशासन  की मदद ले सके!  इसका फायदा यह भी होगा कि जो भी लोग/संस्थाएं अलग-अलग टुकड़ो में मदद करते हैं उनको भी इस एप्प के जरिये निर्देशित किया जा सकता है जिससे यह एक एकीकृत प्रयास होगा और अधिकतम लोगों तक जरूरी सुविधायेंपहुँच सकेंगी!

4) असंतुलित विकास ने जिस तरह से मजदूरों और गरीब तबके का अनियंत्रित पलायन शहरों की ओर बढ़ाया है, उसने शोषण की कई परिस्थितियों को जन्म दिया है!  सरकारों को जरूरत है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार, व्यवसाय व अन्य सुविधाओं और स्थानीय आर्थिकी को विकसित किये जाने की जरूरतों पर निवेश करे और नयी नीतियों को लागू करे! स्थानीय स्तर पर जिला पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों एवं ग्राम पंचायतों को स्वायत्ता दिए जाने हेतु निर्णय लिए जाय!

5)  भारत सरकार ने लॉक डाउन के बाद दिवालिया हुई या आर्थिक रूप से कमजोर भारतीय कंपनियों के विदेशी  कम्पनियों द्धारा अधिग्रहण किये जाने पर रोक लगाई है! लॉक डाउन के बादइन सभी लघु उद्योगों, मझोले उद्योगों , दुकानदारों के व्यवसाय पर बुरा असर पड़ा है! इनको अपने व्यवसाय को दुबारा स्थापित करने में कम से कम साल भर या उससे भी अधिक समय लगेगा छोटे व्यवसायों के नुक्सान से रिक्त बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां उग्रता के साथ उसको हड़पने की कोशिश करेंगी, इसलिए जिस तरह सरकार ने बाहरी कंपनियों द्धारा अधिग्रण पररोक लगाई है उसी तरह देश के छोटे दुकानदारों, व्यवसाईयों के हितों  के लिए जरूरी नीतियाँ बनाये एवं छोटे दुकानदारों और व्यवसायों को दुबारा स्थापित करने में आवश्यक मदद मिल सके!

6) लॉक डाउन के बाद हवा व पानी की गुणवत्ता असाधारण रूप से बेहतर हुई है! गंगा व तमाम नदियों को साफ़ करने के नाम पर पहले सरकारों ने अरबों रूपये खर्च किये हैं परंन्तु नदिया साफ़ नहीं हुई! अभी जो जल स्तर सुधरा है,  नदिया साफ़  हुई हैं! उसका कारण है कि नदियों में औद्योगिक इकाइयों का कचरा  नहीं जा रहा है! हालाँकि पर्यावरण कानून के तहत कोई भी औद्योगिक कचरा नदियों में नहीं बहाया जा सकता है परन्तु पूर्व में सरकारी मिलीभगत से यह सब हो रहा था  और नदियों को साफ़ करने के नाम पर अरबों रुपया डकार लिया गया! इसलिए यह जरूरी है कि इन तमाम औद्योगिक इकाइयों को चिन्हित कर ठोस कार्यवाही हो और नदियों की सफाई के नाम पर जो भ्रष्टाचार हुआ है उसकी सी0बी0आई0 जाँच की जाय!

-पुष्पेश त्रिपाठी 
पूर्व अध्यक्ष
उत्तराखंड क्रांति दल

ukjosh

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