चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा : प्राणशक्ति को ऊर्जावान बना है कूष्मांडा देवी

पवित्र और शुद्ध मन से नवरात्र के चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा की आराधना कर भक्तगण अपनी आंतरिक प्राणशक्ति को ऊर्जावान बनाते हैं। कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी।
शुभानि भदाण्यभिहन्तु चापदः।।

कूष्मांडा का अभिप्राय कद्दू से है। एक पूर्ण गोलाकार वृत्त की भांति मानव शरीर में स्थित प्राणशक्ति दिन-रात सभी जीव-जंतुओं का कल्याण करती है। प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति की वृद्धि करती है। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, ऊर्जा और ‘अंड’ का अर्थ है ब्रह्माण्डीय गोला। धर्मग्रन्थों में मिलने वाले वर्णन के अनुसार अपनी मंद और हल्की सी मुस्कान मात्र से अंड को उत्पन्न करने वाली होने के कारण ही इन्हें कूष्मांडा कहा गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब कूष्मांडा देवी ने महाशून्य में अपने मंद हास से उजाला करते हुए ’अंड’ की उत्पत्ति की, जो कि बीज रूप में ब्रह्म तत्व से मिला और ब्रह्मांड बना। इस प्रकार मां दुर्गा का यही अजन्मा और आद्यशक्ति रूप है। जीवों में इनका स्थान ‘अनाहत चक्र’ में माना गया है।

नवरात्र के चैथे दिन योगीजन इसी चक्र में अपना ध्यान लगाते हैं। मां कूष्मांडा का निवास सूर्य लोक में है। उस लोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके स्वरूप की कांति और तेज मंडल भी सूर्य के समान ही अतुलनीय है। मां कूष्मांडा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। मां के पूजन से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

– सभार

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