सच्चे रामराज्य की स्थापना: बी.के. मन्जु

स्वाधीनता – सपना या सच्चाई

आज भारत देश को स्वतंत्र हुए आधी सदी से भी अधिक समय बीत चुका है लेकिन जो स्वप्न स्वतंत्रता सेनानियों ने इस देश के लिए देखा था उसके पूरे होने के कोई आसार नजर नहीं आते हैं। कई बार बुजुर्ग लोगों से सुनने को मिलता है कि ऐसी स्वतंत्रता से तो ब्रिटिश राज ही अच्छा था। भय से ही सही, कम-से-कम लोग काम तो करते थे।

आज तो चारों और अराजकता का आलम हैं कोई कार्य अथवा परियोजना समय से सम्पन्न नहीं होती है और परीक्षाओं के प्रष्न-पत्र इम्तिहान से पहले ही लीक हो जाते है। विद्यालय मे शिक्षकगण समय से नहीं पहुँचते है, दफ्तर में कोई भी फाइल बिना रिष्वत के आगे नहीं बढ़ती है, क्या यही सच्ची स्वतंत्रता है?

कुल मिलाकर ऐसा जान पड़ता है कि स्वाधीनता नाम के लिए तो प्राप्त हो गयी है लेकिन व्यवहार में उसके कोई लक्षण नहीं दिखते है। स्वतंत्र होकर तो हमें विकास की बुलंदियो पर होना चाहिए था लेकिन कुछ क्षेत्रो को छोड़ दे तो प्रगति के नाम पर चँहु और दिखावा और छलावा ही पजर आता है। आओ, स्वाधीनता के सुअवसर पर हम अपने अंदर झांक कर देखें कि सच्ची स्वतंत्रता का सही भावार्थ क्या है-

सच्चे रामराज्य की स्थापना

कहावत है कि रामराज्य में कोई भी नर-नारी किसी भी प्रकार से दुखी नहीं था। बापू गाँधी जी ने भी स्वाधीनता के उपरांन्त भारत में ऐसे ही रामराज्य की परिकल्पना की थी। लेकिन प्रमाण इसे उल्टे निकले। स्वतंत्र होकर हमारे उत्तरदायित्व और भी बढ़ गये। आज हमें केवल अपने लिए ही नहीं सोचना है अपितु अपने समाज, देश और यहाँ तक कि समस्त विश्व को अपने समक्ष रखकर कार्य करना है। आज स्व-अनूशासित और स्वावलम्बी नागरिकों की जरूरत है जो कि आगे आकर देश का नेतृत्व कर सके। ऐसी भावनाएँ यदि सभी देशवासियो की होगी तो अवष्य ही भारत में रामराज्य की पुनस्र्थापना हो जायेगी।

नारी जाति का सम्मान हो

आज नारी जाति सर्वाधिक असुरक्षित महसूस कर रही है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता – वाले देष में नारी को मात्र भोग्या माना जाता है यह कदाचित स्वतंत्रता का निरादर ही है। महात्मा गाँधी जी ने एक बार कहा था कि एक पुरूष यदि शिक्षित होगा तो वह मात्र अकेला ही शिक्षित रहेगा जबकि एक पढ़ी-लिखी महिला सारे परिवार को शिक्षित कर सकेगी। वास्तव में आज आवश्यकता है। जागरूक नारियाँ अवश्य ही देश को नई दिशा प्रदान कर सकेंगी और देश का भाग्य बदल सकेंगी।

युवाओं का चारित्रिक विकास हो व उनके अंदर देश भक्ति की भावना जाग्रत हो

आज हमारे देश में लोगों का बौद्धिक विकास तो हो रहा है लेकिन सच्चरित्र कम-से-कम होता जा रहा है, जो कि भारत जैसे गौरवशाली राश्ट्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है। स्वाधीनता का सच्चा अर्थ है कि बौद्धिक और चारित्रिक दोनों ही प्रकार के विकास का सामंजस्य हो। एक मोटे अनुमान के अनुसार आज भारत के षीर्श संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करके अधिकतर युवा विदेशों की और कूच कर जाते हैं।

यदि हम प्रतिभा पलायन को रोकना चाहते है तो युवाओं के मन में देशभक्ति की भावना जाग्रत करनी होगी, उन्हें यह सिखाना होगा कि मात्र पैसा कमा लेना ही शिक्षा का उद्वेश्य नहीं है। प्रतिभाशाली और सिद्धांतवादी युवा यदि स्वदेश में ही रहेंगे तो अवश्य ही वे एक नई कार्य संस्कृति को जन्म देंगे। फलतः नवभारत और स्वीर्णम भारत का पुनर्निमाण हो सकेगा।

प्रत्येक व्यक्ति कर्मयोगी हो

गीता में अर्जुन को बार-बार यही शिक्षा दी गई है कि हे अर्जुन! तुम कर्म योगी बनो। वास्तव में गीता के कालजयी महावाक्यों को आज सभी भारतवसियों को अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है। आज हम पूर्णनिष्ठा से कार्य करें और फल ईश्वर के अधीक हो; दे ऐसा करने से मन में विभिन्न प्रकार की शंकाए जन्नम नहीं लेती हैं और क्यक्ति निश्चिन्त रहता है तथा उस कार्य का प्रतिफल भी श्रेष्ठ निकलता है। मानव को सर्वाधिक चिताएँ अपने भविष्य के विषय में ही होती है लेकिन कर्मयोगी क्यक्ति सदैव अपने भविष्य के प्रति आशीन्वत रहता है। उसका दृष्टिकोण सदैव सकारात्मक होता है।

स्वाधीनता दिवस के पावनपर्व पर हम सभी देशवासी बैठकर इस विषय पर सम्पूर्ण चिंतन करे कि क्यों इतना समय बीत जाने के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं आये है। बापू के स्वप्नों का रामराज्य आखिर इतना समय गुजर जाने के बाद भी क्यों स्थपन नहीं हो पाया है।

हम समझते है इसके लिए दृढ़ता और प्रतिबद्धता की महती आवष्य परमात्मा) इस धरा पर अवतरित हो चुका है और स्वर्ग की पुनस्थपिना का भगीरथ कार्य प्रारम्भ हो चुका है तो हमें भगवान को सत्य रुप में पहचान कर उसके बतायें पर चलने की जरुरत है। यदि हम परमात्मा के पथ पर सच्चे मन से चलेंगे तो निकट भविश्य में ही बापू गाँधी जी का रामराज्य का स्वप्न सच्चाई में अवश्य बदल जायेगा सुधी पठकों को स्वतंत्रता दिवस की सहस्त्र बधाइयाँ।

Sushil Kumar Josh

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