निकाय चुनाव से पहले ही ‘हार’ गई सरकार

योगेश भट्ट

देहरादून। विपक्ष सरकार पर कोई आरोप लगाए तो उसके पीछे सियासी मंशा हो सकती है। सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़े हों तो, उसमें भी कोई सियासी साजिश छिपी हो सकती है। लेकिन अगर कोई संवैधानिक संस्था सरकार पर सवाल उठाए तो उसे न ‘साजिश’ कहा जा सकता है और न सियासत।

त्रिवेंद्र सरकार पर राज्य के निर्वाचन आयोग ने प्रदेश में निकाय चुनावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। इतना ही नहीं आयोग उच्च न्यायालय भी पहुंच चुका है। आयोग के सवाल उठाने के बाद यह स्पष्ट है कि फिलहाल प्रदेश में निकाय चुनाव लटक चुके हैं। तय समय पर यानि मई के पहले सप्ताह से पूर्व निकाय चुनाव अब किसी भी दशा में संभव नहीं हैं । राज्य निर्वाचन आयोग की तल्खी और आरोपों के बाद अब तो यह सवाल भी उठ रहा है कि, सरकार खुद समय पर चुनाव नहीं चाहती थी।

सरकार अभी अपने सालाना जश्न के ‘हैंग ओवर’ से भी बाहर नहीं निकली है कि विवादों की श्रंखला में एक नया विवाद और जुड़ गया है। यह विवाद निजी मेडिकल कालेजों में फीस बढ़ाने, आबकारी नीति में संशोधन, गैरसैण पर सरकार के रुख और विधायकों की निधि व सुविधाएं बढ़ाने जैसे सियासी नहीं हैं। इन मसलों में सीधे तौर पर सरकार की सियासत जुड़ी है । लेकिन राज्य निर्वाचन आयोग ने जिस तरह सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, वह सरकार की परिपक्वता, समझ, गंभीरता व दूरदर्शिता पर भी सवाल है । इस विवाद में सरकार की छवि को गहरा नुकसान होने जा रहा है।

मसला यह है कि मई के पहले सप्ताह में प्रदेश के नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए चुनाव का अभी तक कार्यक्रम भी जारी नहीं हुआ है। अभी न परिसीमन फाइनल हुआ है और न सीटों का आरक्षण। राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी कार्यकाल खत्म होने से पूर्व चुनाव सपंन्न कराने की है पर सवाल यह है कि आयोग चुनाव कराए तो कैसे ? यूं तो उत्तराखंड में भी पिछले छह महीने से चुनाव की तैयारियां चल रही हैं, उम्मीद की जा रही थी अप्रैल के प्रथम सप्ताह में नगर निकाय चुनाव की आचारसंहिता जारी हो जाएगी । लेकिन सरकार के सीमा विस्तार के फैसले के बाद निकायों के परिसीमन को लेकर 24 निकाय उच्च न्यायालय की शरण में है। प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है।

इस बीच न्यायालय ने सरकार को परिसीमन के मसले पर विधिवत आपत्ति मांगने और उनका निस्तारण करने को कहा है। सरकार को यह काम निश्चित समय में करना था लेकिन अभी वह भी पूरा नहीं हुआ है। परिसीमन के बाद फिर आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होनी है । कुल मिलाकर पूरे मामले में सरकार की हीलाहवाली साफ नजर आने लगी है, राज्य निर्वाचन आयोग का भी यही आरोप है। हालांकि सरकार का पक्ष यह है कि आयोग सरकार की मंशा को नहीं समझ पा रहा है।

अब जबकि स्थिति साफ है तो सवाल यह उठ रहे हैं क्या सरकार खुद अभी चुनाव नहीं चाहती थी ? अगर ऐसा है तो फिर सरकार लगातार यह दावा करती क्यों आ रही है कि प्रदेश में निकाय चुनाव समय पर होंगे । इसमें कोई दोराय नहीं कि यह स्थिति सरकार के उस फैसले से खड़ी हुई है, जिसमें सरकार ने बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों को नगर निकायों में शामिल किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के इस फैसले का बड़ा विरोध है । कई स्थानों पर तो पार्टी के ही नेता कार्यकर्ता इसके विरोध में हैं। सरकार के इस फैसले को जमीनों के काले कारोबार से जोड़ कर भी देखा जा रहा है। यह माना जा रहा है कि इस फैसले से सैकड़ों हेक्टेअर भूमि भू कानून के दायरे से बाहर आयी है । मौजूदा हालात में एक बार फिर इससे जुड़े आरोप ‘हरे’ होने लगे हैं।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिस तरह सरकार का बेनकाब किया उससे साफ है कि सरकार खुद इस वक्त निकाय चुनाव से बचना चाह रही है । ऐसा नहीं है तो क्यों मुख्यमंत्री साल भर एक भी बार मुख्य निर्वाचन अधिकारी को मिलने का समय ही नहीं दिया ? जबकि मालूम था कि मई के पहले सप्ताह में नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है । आयोग का आरोप है कि चुनाव के लिये 17 करोड़ रुपए मांगे एक भी रुपया नहीं दिया गया । यह अगर सच है तो आखिर सरकार की इसके पीछे मंशा क्या है ? एक तरह से आरोप है कि सरकार संवैधानिक संस्था की अनदेखी कर रही है। सरकार उच्च न्यायालय का बहाना ले रही है लेकिन सवाल यह उठता है कि समय पर चुनाव की तैयारियों कराने का काम किसका है । सरकार ने ठीक चुनाव से पूर्व सीमा विस्तार क्यों किया? किया तो उसके लिये पूरी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनायी ? सरकार की नजर में क्या राज्य निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की भी कोई अहमियत नहीं ? जबकि समय पर चुनाव कराने के स्पष्ट निर्देश उच्चतम न्यायालय के भी हैं।

सरकार लाख कुछ कहे लेकिन इस मामले में सरकार की किरकिरी तो हुई है । यह भी माना जा रहा है कि सरकार 2019 से पहले चुनाव कराने से डर रही है । क्या यह सही है कि सरकार को हार का भय संता रहा है । यदि ऐसा है तो सरकार तो चुनाव से पहले ही नगर निकायों में हार स्वीकार कर चुकी है।

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