‘ग्रैजुएट’ काम पर रखने लायक नहीं हैं

काम के नौजवा

अक्सर यह शिकायत की जाती रही है कि हमारे ग्रैजुएट काम पर रखने लायक नहीं हैं। यह धारणा हाल के एक सर्वेक्षण से बदल जानी चाहिए। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन, कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज और यूनाइटेड नेशंस डिवेलपमेंट प्रोग्राम जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के अलावा दो स्वतंत्र एजंसियों पीपलस्ट्रांग और वीबॉक्स के संयुक्त सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के नए स्नातकों में रोजगार योग्यता (इम्प्लॉएबिलिटी) ठीक-ठाक बढ़ी है। यह सर्वेक्षण 120 कंपनियों और 510,000 छात्रों के बीच किया गया। रोजगार योग्यता या नियोजनीयता मैनेजमेंट की भाषा में हाल में ही शामिल हुई एक अवधारणा है। 1997 में सबसे पहले सुमंत्र घोषाल ने इसे पेश किया था। इसका अर्थ है मूल्य उत्पादक कार्य करना, इसके जरिए धन अर्जन करना और काम करते हुए अपनी क्षमता बढ़ाना ताकि भविष्य में और बेहतर काम मिल सके। प्रचलित अर्थों में हम इसे निपुणता भी कह सकते हैं।

 

स्नातकों में कॉरपोरेट नौकरियों

भारत में तकनीकी शिक्षा को छोड़कर बाकी अनुशासनों को इसके दायरे से बाहर माना जाता था। यानी इनसे आए ग्रैजुएट सरकारी नौकरियों के सांचे में भले ही फिट हो जाएं, पर उत्पादक कार्यों के लिए वे उपयोगी नहीं होते। बहरहाल, यह सर्वेक्षण बताता है कि अभी हर तरह के स्नातकों में कॉरपोरेट नौकरियों के लायक योग्यता पैदा हुई है। पिछले साल के मुकाबले इस साल इसमें काफी वृद्धि देखी गई है। जैसे, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इम्प्लॉएबिलिटी 2016-17 में 50.69 प्रतिशत थी, जो 2017-18 में 51.52 फीसदी हो गई। फार्मास्युटिकल्स में यह पिछले साल 42.3 फीसदी थी, जो इस साल 47.78 फीसदी हो गई। सबसे आश्चर्यजनक उछाल कंप्यूटर ऐप्लिकेशंस में देखा गया, जहां यह 31.36 पर्सेंट से बढ़कर 43.85 पर्सेंट हो गई। बीए में यह 35.66 फीसदी थी जो 37.39 फीसदी हो गई। एमबीए और बीकॉम की रोजगार योग्यता में गिरावट आई है। इसमें उछाल आना 2014 से शुरू हुआ, जब यह 34 प्रतिशत से 46 प्रतिशत पर पहुंच गई थी।

यानी पाया गया कि हर दो नए ग्रैजुएट में से एक रोजगार देने लायक है। इंजीनियरों के बारे में रतन टाटा ने कहा था कि उनमें ज्यादातर रोजगार के लिए अपेक्षित पात्रता नहीं रखते। लेकिन अभी उनमें 52 प्रतिशत रोजगार के लायक हैं। सबसे ज्यादा योग्य कंप्यूटर साइंस पढ़ रहे छात्रों को माना जाता है। सर्वेक्षणकर्ताओं का मानना है कि इधर कई संस्थानों ने बदलते वक्त को पहचान कर अपने कोर्सेज का ढांचा बदला है, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा है और अपने स्टूडेंट्स को एंप्लॉएबल बनाने के लिए लीक से हटकर प्रयास किए हैं। इससे सरकार के सामने चुनौती भी बढ़ गई है, क्योंकि एक निपुण वर्कफोर्स बेरोजगारी को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाएगी।

Sushil Kumar Josh

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