अब नहीं तो फिर कबः मनुष्य जन्म एक सुअवसर है परमात्मा को प्राप्त करने का!

जीव की सद्गति परमात्मा की कृपा से ही हो पाती है। परमात्मा को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदा सत्कर्म करते रहना पड़ता है। परमात्मा के मार्ग पर चल कर ही जीव का कल्याण संभव हो पाता है। प्रकृति जड़ और चेतन तत्व से निर्मित है।

माया जड़ तत्व है और ब्रह्म चेतन तत्व है। इसकी तीन अवस्था है- अचेतन, जिसे जड़ कहते हैं। चेतन, जिससे चित्त और चेतना की जागृति होती है। पराचेतन, जिसे जीव की चेतना की चरम-परम अवस्था कहते हैं। जड़ता के कारण व्यक्ति पशुता को धारण किए रहता है। उसे अच्छा-बुरा, सत्य-असत्य, स्वार्थ-परमार्थ का ज्ञान नहीं रहता। उसे जितनी समझ होती है, उसके आधार पर वह जीवन बसर करता है और अंततः दुनिया से विदा हो जाता है।

मनुष्य जन्म एक सुअवसर है। 84 लाख योनियों के भ्रमण से व्यक्ति बच सकता है। तथा स्वयं का उद्धार इस अवसर का फायदा उठाकर कर सकता है। अन्य जीवों को बनाने में परमात्मा को कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ी, लेकिन मनुष्य को गढ़ने में परमात्मा को बहुत परिश्रम करना पड़ा।

अंतदृष्टि की जागृति के बिना व्यक्ति जीवन के सत्य और स्वयं के मूल्यांकन से अनभिज्ञ रहता है। अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के पश्चात व्यक्ति परमात्म-स्वरूप हो जाता है। मनुष्य समस्त ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी होकर भी पग-पग ठोकर खाते हुए भिखारी बनकर पशुतुल्य जीवनयापन करता है। यही मनुष्य की नासमझी है। व्यक्ति अपनी इस आंख से पैर, हाथ, पेट, जंघा को समान भाव से देखता है, शरीर के किसी अंग में कोई तकलीफ होती है, तो वह दुखी होता है, क्योंकि सभी अंग-अवयव शरीर में समान रूप से संबद्ध हैं। मनुष्य अंग-अवयव में हो रहे दुख को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

उसी प्रकार ब्रह्मांड में जो जीवधारी प्राणी हैं, वे परमात्मा के अंशधर हैं, क्योंकि परमात्मा ने सभी प्राणियों को रचा है। उनमें सभी प्राणियों के लिए समान रूप से ममता है। किसी प्राणी को कोई सताता है, दुख देता है, तो परमात्मा को कष्ट पहुंचता है। सभी भूतों में समान रूप से वे ही विद्यमान हैं। इसी की अनुभूति के लिए अंतर्दृष्टि के जागरण व आत्मबोध की आवश्यकता मनुष्य को है। इसके जागरण से व्यक्ति में समदर्शिता का भाव उत्पन्न हो जाता है। सभी प्राणियों में उसे परमात्मा को स्वरूप दिखने लगता है और उसे आत्मबोध हो जाता है।

आत्मबोध होना ही जीव की चरम-परम अवस्था है। उसकी स्थिति ‘आत्मवत्-सर्वभूतेषु’ की हो जाती है। उसे सारा संसार ही अपना परिवार दिखता है। जीव और ब्रह्म में तादात्म्य स्थापित होता है, तो जीव और ब्रह्म की एकरूपता-समरूपता जानी जाती है। यही जीव की चरम-परम अवस्था होती है। यही जीव की चित और चेतना की जागृति है, जिसे अंतदृष्टि का जागरण कहा जाता है। व्यक्ति अपनी तुच्छता-पशुता का त्याग कर महानता का पथ ग्रहण कर जीवात्मा से परमात्मा की यात्रा पूर्ण कर जीवन का उद्धार कर पाता है।

इस संसार में माया और ब्रह्म दोनों ही समान रूप से हैं। जब तक जीव माया में आसक्त रहता है, तब उसकी स्थिति दीन-हीन बनी रहती है। जब जीव माया से आसक्ति हटाकर ब्रह्म से तादाम्य स्थापित करता है, तब उसकी चरम-परम अवस्था होती है। परमात्मा की अनुभूति बोध की स्थिति है, परमात्मा का साक्षात्कार है, परमात्मा की प्राप्ति है और परम आनंद की प्राप्ति की पराकाष्ठा है।

– साभार

Sushil Kumar Josh

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