उत्तराखण्ड में मंदिरों का सबसे बड़ा समूह जागेश्वर धाम -जानिए खबर

देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य में आठवीं से दसवीं सदी में निर्मित एक विशाल एवं बड़ा मंदिरों का समूह है। जिसें जागेश्वर धाम कहा जाता है। यहां प्रकृति ने सुन्दर छठी बिखेरी है। जहां देवदार के वृक्षों के बीच संकरी घाटी के बीत कलात्मक मंदिरों का निर्माण कत्यूरी राजा शालिवाहन देव ने कराया था। यहां अनेक छोटे बड़े मंदिरों का एक समूह है। जिसमें जागनाथ, महामृत्युंजय, पंचकेदार, डंडेश्वर, कुबेर, लक्ष्मी पुष्टि देवी के मंदिर प्रमुख हैं।

बताया जाता है कि यहां का सबसे प्राचीन मंदिर मृत्युंजय मंदिर व सबसे विशाल मंदिर दिनदेशवारा है। यहां से कुछ ही दूरी पर उत्तर में प्राचीन वृद्ध जागेश्वर मंदिर है। मुख्य मंदिर परिसर एक ऊंची, पत्थर की दीवार से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह जागेश्वर धाम कहलाता है।

यह मंदिर अल्मोड़ा नगर से 39 किमी की दूरी पर जटा गंगा के किनारे 124 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है। दूर से ही मंदिरों के शिखर दिखाई पड़ रहे थे। जागेश्वर धाम मंदिर परिसर में 124 मंदिर हैं जो भगवान् शिव को उनके लिंग रूप में समर्पित हैं। कुछ मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में भी बनें हैं। कहा जाता है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है।

बता दें कि जागेश्वर का जिक्र चीनी यात्री हुआन त्सांग ने भी अपनी यात्रा संस्मरण में किया है। अधिकाँश मंदिरों का निर्माण कत्युरी राजवंश के शासकों ने करवाया था, जिन्होंने यहाँ 7 वीं.ई. से 14 वीं.ई. तक राज किया। तत्पश्चात इन मदिरों की देखभाल की चन्द्रवंशी शासकों ने जिन्होंने 15वी. से 18वी. शताब्दी तक यहाँ शासन किया। मंदिर के शिलालेखों में मल्ला राजाओं का भी उल्लेख है।

हालांकि प्रत्येक मन्दिर के भिन्न भिन्न नाम हैं। कुछ शिव के विभिन्न रूपों पर आधारित और कुछ समर्पित हैं नवग्रह जैसे ब्रह्मांडीय पिंडों पर। एक मंदिर शक्ति को समर्पित है जिसके भीतर देवी की सुन्दर मूर्ति है। एक मंदिर दक्षिणमुखी हनुमान तो एक मंदिर नवदुर्गा को भी समर्पित है। अधिकतर मंदिरों के भीतर शिवलिंग स्थापित हैं।

मंदिरों के नामों पर आधारित शिलाखंड पट्टिकाएं मंदिरों के प्रवेशद्वारों पर लगाए गए है। जैसे कुबेर मंदिर के ऊपर कुबेर पट्टिका, लाकुलिश मंदिर के ऊपर लाकुलिश पट्टिका। इसी तरह तान्डेश्वर मन्दिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगी पट्टिका पर नृत्य करते शिव का शिल्प है। जागेश्वर मंदिर परिसर के अधिकाँश मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित हैं जिस में मंदिर संरचना में उसके ऊंचे शिखर को प्रधानता दी जाती है।

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