प्यार और मिलवर्तन का अनोखा संगम है निरंकारी संत समागम; ईश्वर को जानने के बाद बदलता जाता है आध्यात्मिक जीवन -जानिए खबर

देहरादून। धर्म समाज के सभी वर्गों में आध्यात्मिक जाग्रति, नैतिकता व सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करने का साधन है। आवश्यकता है अहिंसक आध्यात्मिकक्रांति की, जो मानव में निहित उच्च मानवीय मूल्यों को जाग्रत कर सके। सही मायनों में धर्म का अर्थ है ईश्वर की अनुभूति या जानकारी प्राप्त करना है। जिससे समाज में मनुष्य के मानवीयता तथा विश्वबंधुत्व स्थापित हो सके। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन, हरिद्वार बाईपास, देहरादून में आयोजित रविवारीय सत्संग कार्यक्रम में पधारे सन्तों-भक्तों को निरंकारी सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का पावन सन्देश देते हुए ज्ञान प्रचार बहन पिंकी जी ने व्यक्त किये।

उन्होंने आगे कहा कि 16, 17 एवं 18 नवम्बर 2019 को यानि कि इसी माह समालखा हरियाणा में निरंकारी मिशन का 72वां निरंकारी वार्षिक संत समागम होने जा रहा है जिसमें देश विदेश से अनेकों श्रद्धालु, संत, भक्त ईश्वर निरंकार प्रभु के साक्षात दर्शन पाकर अपना ये जीवन तो सुखी करेंगे ही साथ ही अपना परलोक भी संवारेंगे।  ईश्वर को जानने के बाद व्यक्ति की सोच में परिवर्तन आता है। वह स्वयं को समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सोच के साथ आसानी से जोड़ पाता है। एक जिम्मेदार समाज द्वारा आध्यात्मिक ठहराव को प्राप्त करना विश्व में धर्म तथा विकास की ओर कदम है जिससे सभी के जीवन में आध्यात्मिकता तथा भौतिकवाद का संतुलन स्थापित होता हैं।

विश्व के अग्रिम संस्थान- यूनाइटेड नेशंस (यू एन ओ) ने यह माना है कि आज का समाज सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरण के प्रदूषण की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसको बदलने का एक ही रास्ता है कि हम पुनः विचार करें और स्वीकार करें कि मानवीय जीवन के साथ-साथ इस धरा पर बसने वाले अन्य जीव भी महत्वपूर्ण हैं। तभी हम दूसरे प्राणियों के साथ तथा पर्यावरण के साथ सद्भाव से रह पाएंगे। हम सह-आस्तित्व को स्थापित करें जो सबके लिए लाभप्रद हो।

विश्व के वैज्ञानिक लगातार हमें सचेत कर रहें है कि हमारे पास समय बहुत कम है जिसमें विशेष परिवर्तन की आवश्यकता है। जिससे हम पर्यावरण से स्वयं को सकारात्मक रुप में जोड़ कर वर्तमान की निर्जीव, संवेदन शून्य व केंद्रित जीवनशैली को अधिक सार्थक, सतत, स्वस्थ तथा जीवन दायनी बना सकें।

इसके लिए सर्वप्रथम हमें समझना होगा कि आज विश्व पर जो संकट है उसका समाधान केवल आध्यात्मिकता है। यह बदलाव होगा मानसिकता का, जो इंसानी जीवन के मर्म तक जाती है। अगर आज विश्व विकास की ओर तेजी से बढ़ रहा है तो तेजी से विनाश की ओर भी बढ़ रहा है। इस स्थिति में हल केवल ईश्वर की जानकारी पर आधारित आध्यात्मिकता है। मानवीय जीवन में उथल-पुथल तथा हिंसा को रोकने और मानवीय मूल्यों का पुनःस्थापन केवल आध्यात्मिकता ही कर पायेगी। आध्यात्मिकता ही वह परिवर्तन का स्त्रोत है जो हमें मानवीय जिम्मेदारियां की ओर सजग करता है।

निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी का सन्देश ’यदि शांति पर आधारित विकास समय की मांग है, तो ईश्वरीय ज्ञान के द्वारा आध्यात्मिक जाग्रति ही एकमात्र साधन है‘ आज के परिवेश में सार्थक साबित होता है।निंरकारी मिशन द्वारा दिए गए सन्देश ’धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं‘ तथा ’एक को जानो, एक को मानो, एक हो जाओं विश्व कोआध्यात्मिकता की ओर पे्ररित करने का प्रयास कर रहे हैं।

इस वर्ष निरंकारी मिशन में उत्तराखण्ड के हर जनपद देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी से लगभग 50,000/-निरंकारी भक्त सद्गुरु के दर्शनों के लिए समागम में पहंुचेंगे। वहीं सन्तों के रहने की पूर्ण व्यवस्थाओं को निरंकारी सेवादल के द्वारा सुन्दर रूप प्रदान किया जा रहा है जैसे पड़ाल, प्याऊ, लंगर, पार्किग, डिस्पैन्सरी एवं कैन्टीन, इत्यादि की समस्त व्यवस्था को निरंकारी सद्गुरू माता सुदिक्षा जी महाराज के आशीर्वाद से लगभग 10,000/- सेवादार प्रत्येक दिन अपनी-अपनी सेवाओं को निभा रहें है। सत्संग समापन से पूर्व अनेकों संतों, भक्तों ने अपनी-अपनी भाषा का सहारा लेकर संगत को निहाल किया। मंच संचालन शीतल डोला जी ने किया।

90 वर्षों से निरंकारी मिशन का इतिहास

गत् 90 वर्षों से संत निरंकारी मिशन आध्यात्मिकता द्वारा विश्व में बदलाव लाने का प्रयास कर रहा है। मिशन एक आध्यात्मिक विचारधारा हैं, जो वर्तमान में सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के दिव्य मार्गदर्शन में, ’ब्रह्म की प्राप्ति, भ्रम की समाप्ति‘ का सन्देश जन-जन तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है।  मिशन का शुभारम्भ 25 मई 1929 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ। यह दिन था -जिस दिन बाबा अवतार सिंह जी ने अपने सद्गुरु बाबा बूटा सिंह जी से ईश्वर की अनुभूति प्राप्त की और स्वयं को इस ब्रह्मज्ञान की आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लिए स्वयं को समर्पित किया।

बाबा बूटा सिंह जी व बाबा अवतार सिंह जी ने करीब 14 वर्षों तक मिलकर ब्रह्मज्ञान की आवाज को फैलाने का काम किया। दोनों दिव्य व्यक्तित्व जगह-जगह जा कर लोगों के बीच मिशन के सन्देश को 14 वर्षों तक पहुंचाते रहे। सन् 1943 में बाबा बूटा सिंह जी ब्रह्मलीन हो गए परन्तु शरीर त्यागने से पहले उन्होनें बाबा अवतार सिंह जी को मिशन की जिम्मेदारी सँभालने के लिए अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस प्रकार निरंकार बाबा अवतार सिंह जी के शरीर में प्रगट हुआ। बाबा अवतार सिंह जी ने 1947 में भारत के विभाजन के समय दिल्ली आकर मिशन को एक सुदृढ़ प्रबंध व्यवस्था प्रदान की।

उन्होने 1948 में संत निरंकारी मंडल का पंजीकरण करवाया। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए 3 दिसंबर 1963 को बाबा अवतार सिंह जी ने एक साधारण प्रचारक के रूप में कार्य करने का निर्णय किया। और स्वयं 7 वर्षों तक एक गुरसिख रुप में मिशन का सदेशं मानवमात्र तक पहुचातें रहें। परिणाम स्वरुप बाबा अवतार सिंह जी द्वारा मनोनीत बाबा गुरबचन सिंह जी सद्गुरु के रूप में प्रगट हुए परन्तु इसकी औपचारिक घोषणा 5 नवंबर 1963 को दिल्ली के वार्षिक संत समागम के अवसर पर हो सकी। बाबा गुरबचन सिंह जी ने मिशन के आध्यात्मिक सन्देश को देने के साथ साथ समाज कल्याण की और भी कदम बढ़ाये।

सत्य के प्रसार में मानवता विरोधी व कट्टरपंथियों द्वारा मिशन की आवाज को रोकने के लिए कई प्रकार के प्रयास किये जाने लगे और इन्ही के बीच 24 अप्रैल 1980 को बाबा गुरबचन सिंह जी ने अपने जीवन का मानवता की बलिवेदी पर महान बलिदान दे दिया। परन्तु जाते-जाते अपनी दैवी जिम्मेदारी को निभाते हुए बाबा हरदेव सिंह जी को मिशन का भावी मार्गदर्शक नियुक्त कर दिया। यद्यपि बाबा हरदेव सिंह जी 24 अप्रैल को ही सद्गुरु रूप में प्रगट हो गए थे परन्तु औपचारिक घोषणा 27 अप्रैल 1980 को की गयी।

वर्ष 1980 से बाबा हरदेव सिंह जी ने अपने दिव्य मार्गदर्शन में मिशन की आवाज को न केवल देश के कोने-कोने में पहुंचाया बल्कि विदेशों में भी सत्य के सन्देश को व्यापक रूप से पहुँचाया। बाबा हरदेव सिंह जी के करीब 36 वर्षों के मार्गदर्शन में मिशन की 3000 शाखाएं स्थापित हुईं जिनमंे से 200 के लगभग दूर देशों में हैं। इसी तरह विश्वभर में भारत सहित 700 के लगभग सत्संग भवन स्थापित हुए।

परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बाबा हरदेव सिंह जी ने अपने जीवन काल में ही पूज्य माता सविंदर हरदेव जी को मिशन का अगला मार्गदर्शक बनाने की इच्छा व्यक्त कर दी थी। जबकि उन्होनें 13 मई 2016 को कनाडा में एक कार दुर्घटना में अपने शरीर को त्याग दिया। बाबा हरदेव सिंह जी ने अपने काल में मिशन को एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा और आध्यात्मिक आधार दिया। सदगुरु 13 मई 2016 को ही माता सविंदर हरदेव जी में प्रगट हो चुका था, परन्तु औपचारिक घोषणा साध संगत में 17 मई 2016 को की गई। अपने गिरते स्वास्थ्य के चलते सद्गुरु माता जी ने देवी विधान को आगे बढ़ाते हुए पूज्य सुदीक्षा जी को मिशन के भावी मार्गदर्शक रूप में 16 जुलाई 2018 को घोषित कर दिया।

सद्गुरु अपना स्वरुप बदल चुका था। औपचारिक समारोह हुआ 17 जुलाई 2018 को जिस दिन माता सविंदर हरदेव जी ने सद्गुरु रूप में पूज्य सुदीक्षा जी के मस्तक पर तिलक किया और उन्हें सद्गुरु के आसान पर विराजमान कर दिया और सद्गुरु की आध्यात्मिक शक्तियों का प्रतीक सफेद दुपट्टा उनके गले में पहनाया। वर्तमान में सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज जी संत निरंकारी मिशन के द्वाराविश्व को ‘एक धरा, एक परिवार तथा एक निंरकार‘ का सन्देश दे कर विश्व में मानवीय एकता स्थापित करने में प्रयासरत हैं।

ukjosh

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