पंचतत्व में विलीन हुए परिपूर्णानंद पैन्यूली; CM ने उनके पार्थिव शरीर पर अर्पित किया पुष्प चक्र

देहरादून। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने रविवार को बसंत विहार, देहरादून में स्वतंता संग्राम सेनानी एवं पूर्व सांसद श्री परिपूर्णानंद पेन्यूली के पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र अर्पित किये। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति व दुख की इस घड़ी में उनके परिजनों को धैर्य प्रदान करने की ईश्वर से कामना की।

बता दें कि मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री परिपूर्णानंद पेन्यूली जी ने देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक प्रखर वक्ता के साथ ही उन्होंने साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। आजादी के बाद उन्होंने सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भी अनेक कार्य किये। साथ ही कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भी पैन्यूली के शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि परिपूर्णानंद पैन्यूली ने जीवनभर समाज के गरीब, असहाय व निम्न वर्गों के बीच रहकर काम किया।

प्रीतम सिंह ने कहा कि स्वर्गीय पैन्यूली समाज सेवा के साथ-साथ एक अच्छे साहित्यकार भी थे, उनके निधन से हमने एक अच्छा नेता व साहित्यकार खो दिया है जिसकी भरपाई करना कठिन है। दुख व्यक्त करने वालों में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय, प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना, प्रदेश प्रवक्ता गरिमा दसोनी, महानगर अध्यक्ष लालचंद शर्मा, महेश जोशी आदि ने शोक व्यक्त किया।

Parimalanand-Penuliटिहरी के बाशिंदे एक ओर तो अंग्रेजी दासता की बेडिय़ों में जकड़े हुए थे, वहीं रियासत की ओर से लागू नियम, कायदे और प्रतिबंधों ने भी उन्हें घुट-घुटकर जीने पर मजबूर कर दिया था। यही वजह थी कि यहां के लोगों को आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के साथ राजसत्ता से भी संघर्ष करना पड़ा।

राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों में एक नाम जाखणीधार ब्लॉक के छौल गांव निवासी परिपूर्णानंद पैन्यूली का था। पैन्यूली ने राजशाही के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया, तो वहीं तख्तापलट क्रांति का नेतृत्व भी उन्होंने किया। टिहरी रियासत के भारत में विलय के बाद वर्ष 1971 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पूर्व टिहरी नरेश मानवेंद्र शाह को लोकसभा चुनाव में भी शिकस्त दी। टिहरी रियासत के इस क्रांतिकारी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री और आगरा से एमए (समाजशास्त्र) की उपाधि ग्रहण की। भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।

मेरठ, लखनऊ और टिहरी रियासत की जेलों में उन्होंने छह वर्ष से अधिक का बंदी जीवन बिताया। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मेरठ बम कांड में पकड़े जाने पर उन्हें पांच वर्ष की कैद हुई। मेरठ जेल में वह चौधरी चरण सिंह के भाई श्याम सिंह, बनारसी दास और भैरव दत्त धूलिया आदि के साथ रहे। इसी दौरान उन्होंने जेल से फरार होने का प्रयास भी किया मगर सफल नहीं हुए। जेल से ही रहकर उन्होंने इंटर की परीक्षा पास की।

ब्रिटिश सरकार की जेलों से मुक्त होने के बाद वह टिहरी आ गए और उसी दौरान वहां चल रहे किसान आंदोलन में शामिल हो गए। उनके भांजे बृजभूषण गैरोला ने बताया कि आंदोलन के दौरान पकड़े जाने पर 24 जुलाई 1946 को उन्हें टिहरी जेल भेजा गया। जेल की अमानवीय स्थिति के खिलाफ उन्होंने 13 से 22 सितंबर तक भूख हड़ताल भी की।

27 नवंबर 1946 को राजद्रोह के आरोप में उन्हें डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। तब एक नाटकीय घटनाक्रम में 10 दिसंबर 1946 के दिन वह टिहरी जेल से फरार हो गए। टिहरी जेल से फरार होने के बाद परिपूर्णानंद पैन्यूली ने दिसंबर की कड़ाके की ठंड में भिलंगना और भगीरथी नदियां पार कीं और नंगधड़ंग साधू वेश में जंगलों से भटकते-भटकते चकराता पहुंच गए। वहां से साधू वेश में देहरादून आए और दूसरे ही दिन दिल्ली चले गए।

जहां उनकी मुलाकात जयप्रकाश नारायण और जवाहर लाल नेहरू से हुई। पैन्यूली के भतीजे संपूर्णानंद व विवेक पैन्यूली के अनुसार जयप्रकाश नारायण ने उन्हें ’शंकर’ छद्म नाम देकर मुंबई भेज दिया। वहां एक राजनीतिक जलसे के दौरान उनकी मुलाकात संयुक्त प्रांत के प्रीमियर पंडित गोविंद बल्लभ पंत से हुई। उन्होंने पैन्यूली को ऋषिकेश में रहकर गतिविधियां चलाने की सलाह दी। ताकि टिहरी पुलिस उन्हें ब्रिटिश इलाके से पकड़ न सके।

ऋषिकेश में पैन्यूली ने टिहरी राजशाही के खिलाफ चल रहे आंदोलन के प्रमुख नेता भगवानदास मुल्तानी के घर को अपना ठिकाना बनाया। उस आंदोलन में मुल्तानी का घर श्रीदेव सुमन और नागेंद्र सकलानी जैसे बड़े आंदोलनकारी नेताओं का ठिकाना हुआ करता था।

टिहरी में 26-27 मई 1947 को हुए अधिवेशन में परिपूर्णानंद पैन्यूली को उनकी अनुपस्थिति में ही प्रजामंडल का प्रधान और दादा दौलतराम को उप प्रधान चुन लिया गया। क्योंकि पैन्यूली जेल से भगोड़े थे और उनके प्रत्यर्पण की सारी औपचारिकताएं भी पूर्ण थीं इसलिए वह देश की स्वतंत्रता तक प्रतीक्षा करते रहे। 15 अगस्त 1947 को जैसे ही देश आजाद हुआ वह टिहरी चल पड़े।

उसी दिन उन्हें नरेंद्रनगर में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जहां उनके साथ अमानुषिक बर्ताव हुआ। जिसके खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल की। पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद राजशाही के खिलाफ आंदोलन और अधिक भड़क उठा। भारी जनाक्रोश के चलते उन्हें सितम्बर 1947 में रिहा कर दिया गया।

उसके बाद उन्होंने राजशाही की हुकूमत पलटवाकर ही दम लिया। विलय की प्रक्रिया, टिहरी विधानसभा के चुनाव और अंतरिम सरकार के गठन में उनकी अहम भूमिका रही।

राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ आंदोलन के जननायक रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्व सांसद परिपूर्णानंद पैन्यूली का दिल हमेशा गरीब और शोषित वर्ग के लिए धड़कता था। राजशाही के खिलाफ आंदोलन में गंगा घाटी के लोग परिपूर्णानंद पैन्यूली के साथ सक्रिय रहे।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिंद्रिया लाल कहते हैं कि जब भी वे मिलते, कहते थे मुझे बूढ़ा मत कहो, मैं अभी जवान हूं। बताओ कहां किस से लडना है। पैन्यूली वह व्यक्ति हैं जिन्होंने टिहरी रियासत के अंतरिम राजा रहे मानवेंद्र शाह को लोकसभा चुनाव में हराकर राज परिवार की लगातार जीत का तिलिस्म भी तोड़ा था।

परिपूर्णानंद पैन्यूली का उत्तरकाशी से काफी लगाव था। उत्तरकाशी, यमुना घाटी और जौनसार क्षेत्र में अनुसूचित जाति के परिवार में शिक्षा की स्थिति काफी खराब थी। इन बच्चों की शिक्षा के लिए 1985 में उन्होंने उत्तरकाशी के धारी गांव में हरिजन आश्रम बनाया। इस आश्रम में कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ तक की शिक्षा अनुसूचित जाति के बालकों को निश्शुल्क दी जाती थी। बच्चों के खाने और रहने की व्यवस्था भी निश्शुल्क थी।

इसके संचालन के लिए परिपूर्णानंद पैन्यूली भारत सरकार से सहयोग लेते थे, 2013 में जब वह अस्वस्थ हो गए तो यह आश्रम बंद हो गया। इस आश्रम में पांच वर्षों तक शिक्षक रहे नरेश डोभाल कहते हैं 2013 से पहले परिपूर्णानंद पैन्यूली आश्रम में आते-जाते थे। इस आश्रम में पूरे इलाके के गरीब परिवारों के 250 नौनिहाल पढ़ते थे। पैन्यूली इन बच्चों के लिए कपड़े, कंबल आदि समान लेकर भी आते थे। यहां तक कि बच्चों को वे सही ढंग से पढ़ाई करने और आगे बढने के लिए प्रेरित करते थे।

इस आश्रम से पढ़कर कई बच्चे आगे चलकर अधिकारी और शिक्षक बने हैं। 2013 में जब आश्रम के संचालन के लिए आर्थिक सहयोग नहीं मिला तो बच्चों की टीसी देनी पड़ी। आश्रम बंद होने की बात को लेकर परिपूर्णानंद पैन्यूली काफी दुखी भी हुए थे।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिंद्रिया लाल कहते हैं कि गरीब बच्चों की सेवा के लिए पैन्यूली ने बहुत कुछ किया है। वे हमेशा दबे-कुचले समाज के उत्थान की बात करते थे। उनका निधन समाज के लिए एक बड़ी क्षति है।

उम्र 95 वर्ष, लेकिन जोश जवानों जैसा। कानों से भले ही सुनने में मुश्किल होती हो, लेकिन आवाज इतनी बुलंद कि दूर तक जोश भर दे। स्वतंत्रता सेनानी, टिहरी क्रांति के नायक, सांसद और समाजसेवी परिपूर्णानंद पैन्यूली की शख्सियत ही कुछ ऐसी थी। वह मौजूदा व्यवस्था और हालात से खासे खफा थे। दैनिक जागरण के साथ अपने अंतिम साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि राजनीति में हर व्यक्ति दूसरे को चोर कह रहा है, लेकिन खुद को साफ कहने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा।

भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था के दौर से गुजर रहे देश को लेकर पैन्यूली का कहना था कि यह वर्षों पुरानी समस्याएं हैं, एक दिन में समाप्त नहीं होंगी। आम आदमी को, खासतौर से युवाओं को जागरूक होना पड़ेगा। मेरठ जेल में बिताए वक्त के संस्मरण याद करते हुए पैन्यूली ने बताया कि साथ में जो वरिष्ठ साथी थे, उन्होंने संस्कार और शिक्षा प्रदान की।

अब्दुल कलाम के श्तरजुमा ए कुरानश्, आर्य समाज का ज्ञान, सत्यार्थ प्रकाश, वेद आदि का अध्ययन जेल में रहते हुए ही किया। यह सब अब नहीं है। युवा जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, उसमें न संस्कार है और न ही ज्ञान। पूरी व्यवस्था इसी पर टिकी है। जब तक शिक्षा में मूल्य नहीं होंगे, देश का विकास संभव नहीं है। संस्कार और संस्कृति के बिना किसी समाज या राष्ट्र का विकास नहीं हुआ है। भ्रष्टाचार भी इसी कुसंस्कृति से पनपा है।

पैन्यूली का कहना था कि राजनीतिक दल और व्यक्तियों के लिए स्वहित और स्वार्थ प्राथमिकता बन चुके हैं, देश का विकास या समाज का उत्थान उनके लिए मायने नहीं रखता। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को चोर तो कह रहा है, लेकिन खुद को पाक साफ कहने का हौसला भी किसी में नहीं। अधिकांश मंत्री व चुने गए जनप्रतिनिधियों में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जितनी योग्यता नहीं है, ऐसे में देश का विकास कैसे करेंगे। त्याग और प्रेम की भावना समाप्त हो चुकी है, समाज के हर वर्ग में वैमन्स्य पैदा हो गया है।

वह बताते थे कि राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने राष्ट्रपति आवास को देखकर कहा था कि इतने बड़े आवास की क्या जरूरत, मेरे लिए तो एक चारपाई काफी है। यह सादगी और त्याग की भावना उन्हें महान बनाती है, लेकिन आज ऐसा नहीं है, हर व्यक्ति को विलासिता चाहिए। इस पूरी व्यवस्था के खराब होने में किसी दल विशेष या व्यक्ति विशेष का दोष नहीं है, यहां सब एक जैसे हैं। समाज सुधार की बात सभी कर रहे हैं, लेकिन हकीकत बहुत खराब है।

परिपूर्णानंद पैन्यूली ने अनुसूचित जाति-जनजाति के अधिकारों के लिए भी लड़ाई लड़ी। वह उत्तराखंड हरिजन सेवा संघ के प्रमुख भी रहे और मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर भी आंदोलन किया। चार धामों के अलावा अन्य मंदिरों में भी उन्होंने दलितों के प्रवेश की शुरुआत कराई। इसके अलावा प्रखर पत्रकार और लेखक के रूप में भी उनकी ख्याति थी।

Sushil Kumar Josh

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