वेजुबान पय्यां: प्रदेश की संस्कृति से भी जुड़ा हुआ पय्यां का वृक्ष गुणों की खान -जानिए खबर

  • *आस्था एवं सस्कृति* का प्रतीक *पंय्या* हो रहा है कम। आओ मिल कर पंय्यां के खूब पेड़ *लगायें* *हम* ।
  • *क्यूँ* आप भी सहमत हैं, *पंय्या* हो गया है *कम* ?
  • *क्यूँ* आप के गांव में भी होता है पंय्यां यानी *हिमालयन* *वाइल्ड* *चेरी* ?
  • *क्यूँ* *आपने* भी खाया है *पंय्या* के *पके* हुये *लाल* , *पीले* *फल* ?
  • *आपतो* *जानते* ही हैं *पंय्या** : एक साधारण बृक्ष, फल ही नहीं अपितु औषधीय, शोंन्द्रीयकरण एवं आस्था, संस्कृति का प्रतीक भी है।
  • *फिर* *भी* *क्यूँ* *उपेक्षित* (Neglected) *है* , *पंय्या* ?
  • उत्तराखंड में देवताओं का वृक्ष माने जाने वाले पय्यां (पद्म) को वनस्पति जगत में *_प्रुनस_* *_सेरिसोइडिस_* के नाम से जाना जाता है।
  • रोजेसी परिवार का पय्यां एक ऐसा फर्णपाती बृक्ष है जो,जाडे़ के महीनों, अक्टूबर-नवम्बर से जनवरी-फरवरी तक फूलता, फलता तथा मार्च, अप्रैल, मई में फकता है।

उत्तराखंन्ड में पय्यां प्राकृतिक रूप से 1200 से 2500 मी0 की ऊँचाई तक गांवों के आस पास कृषि खेतों के किनारों पर पाया जाता है। पय्यां को रोपड़ करके 500 मी0 की ऊँचाँई पर भी आसानी से उगाया जा सकता है।

Payan Tree Uttarakhand

पंय्या को अंग्रेजी में हिमालयन वाइल्ड चेरी, बर्ड चेरी, हिन्दी में पदम, पदमकाष्ठा, संस्कृत में चारू, हिमा, कैदरा, मालाया, पदमागन्दी, मराठी में पदमका, पदमकाष्ठा, तमिल में पतुमुगम, मलयालम में पतिमुकम, तेलगू में पदमकला, कन्नड़ में पदमका, खासी में डींग, कडी़तुसू, मीजो में तलईज्वंग तथा नेपाली में पैयु के नाम से जाना जाता है।

धार्मिक आस्था वाले बृक्ष पंय्या की लम्बी आयु होती है। मेरे गांव किमनी, थराली में 30 मी0 लम्बा और लगभग 70 साल पुराना एक मात्र बृक्ष लोगों की उपेक्षा के कारण समय के साथ आज विलुप्त होने की कगार पर खडा़ है। ऊँचे हिमालयी क्षेत्र में उगने वाले पंय्या बृक्ष का महत्व उत्तराखंड में ही नहीं अपितु विश्व के अधिकांश देशों में माना गया है।

पंय्या उत्तराखन्ड के अलाव हिमाचल प्रदेश, कशमीर, आसाम में अका तथा खासी हिल्स, मनीपुर, साउथ वेस्ट चाइना, बर्मा तथा थाइलैंन्ड में भी पाया जाता है। पर्यावरण की दृष्टि से बहूत ही महत्वपूर्ण पय्यां उत्तराखंड की संस्कृति से भी जुडा हुआ है।

उत्तराखंड में यह वृक्ष काफी मात्रा में मिलता है लेकिन लोगों की उपेक्षा के कारण अब इन पेड़ों की संख्या धीरे धीरे कम होती जा रही है जो की एक चिंता का विषय बना हुआ है । पय्यां का वृक्ष गुणों की खान माना गया है। इन्हीं गुणों के कारण लोगों पंय्या के पेड़ का बहुत ज्यादा दोहन तथा रोपड़ ना के बराबर करने की वजह से आज पंय्या विलुप्ति होने की कगार पर आ गया है।

आओ जानिये पंय्या के फायदे

  • पंय्यां के फल ऐसट्रिन्जैंन्ट होते हैं। पय्यां के फलों का सेवन पेट की कई समस्याऐं को दूर करने में फाइदेमन्द बतलाया गया है। पय्यां पके फलों का सेवन पाचन तंन्त्र को ठीक रखने में मददगार माना गया है।
  • पंय्यां के पेड़ की छाल का रस वैकपेन के लिये लाभकारी माना गया है।
  • पंय्या के फलों में एमिगडालिन, प्रुनासिन पाया जाता है। इसका सेवन सांस लेने की तकलीफ में राहत प्रदान करने वाला बतलाया गया है।
  • पंय्या के फूले बृक्ष लीन पीरियड में मधुमख्खी पालन वालों के लिये लाभकारी माने गये हैं। इसके फूलों के परांगण का सेवन मधुमख्खियों द्वारा शुद्व एवं गुणकारी कार्तिक शहद के रूप में हमें उपलब्ध कराया जाता है।
  • पय्यां के पेड़ की छाल से टेनिन तथा पत्तियों से ग्रीन डाई तैयार की जाती है।
  • पय्यां के बीजों से प्राप्त किये गये तेल को फार्मास्यूटिकल परपज में इस्तेमाल किया जाता है।
  • पय्यां के सूखे बीजों का इस्तेमाल बीड्स, नैकलेस बनाने में किया जाता है।
  • स्थानीय लोगों द्वारा पंय्यां की डाल की लकडी़ को राजमा के पौधों की बढ़वार, ककडी़, लौकी इत्यादि की बेल बढ़वार के लिये इस्तेमाल किया जाता है।
  • धार्मिक दृष्टि से पंय्यां की पत्तियों वाली डाल को पवित्र मानकर उपयोग किया जाता है। जिस तरह शहर में लोग आम की पत्तियों की माला घर के द्वार पर गृह प्रवेश या हवन इत्यादि के बाद लगाये जाते है ठीक उसी तरह उत्तराखंड मे इस पेड़ की पत्तियों का इस्तेमाल होता है।
  • पंय्या के पेड की छाल को दवा के साथ ही रंग बनाने मे भी प्रयोग किया जाता है।
  • पंय्या की लकडी को भी चन्दन के सम्मान पवित्र माना गया है। हवन मे पंया की लकडी का इस्तेमाल करना पवित्र माना जाता है।
  • पंया के पेड़ की लकडी़ स्पेशली ढोल ढमाऊं बजाने के काम में भी लाया जाता है। पंय्यां के पेड़ की लकडी़ से वाद्ययंत्र (डोल दमाऊँ) बजाने से दासों द्वारा अलग ही राग पैदा किया जाता है।
  • पय्यां की पत्तियों का इस्तेमाल गाय, बकरियों के सुखे विछोने के रूप में भी किया जाता है, जो आगे चलकर उर्वरा शक्तिदायक खाद का काम करती है।
  • पंय्या के पेड का सांस्कृतिक महत्व भला कौन नहीं मानता होगा।
  • रीति रीवाजों के अनुसार, शादी में प्रवेश द्वार पर पंय्या की शाखाऐं लगाकर निर्माण किया जाता है। साथ ही शादी का मंडप भी पंय्या की शाखाओं के बगैर अधूरा माना जाता है।
  • पय्यां की लकडी़ मजबूत होती हैं, जिस कारण इसका इस्तेमाल सिर्फ जलाने तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि इससे गेहूं कूटने वाला डंडा, गाय, भैंस बांधने के कीले, कृषि उपकरणों के हत्थे (बिन्डे)भी बनाये जाते हैं।
  • पंय्या का पर्णपाती बृक्ष बहुत ही खूबसरत होने के कारण शोंन्द्रीकरण के लिये भी काफी उपयुक्त माना गया है।

क्यूँ कभी वेजुबान पय्यां बोल पायेगा, मेरा इस्तेमाल भी और उपेक्षा भी, किसलिये?

अगर आप सहमत हों तो पय्यां के पके फलों के सेवन के साथ ही  इस गुणकारी पवित्र वृक्ष को बचाने के लिऐ अपने अपने स्तर से भगीरथ प्रयास करना आज से ही शुरू करें। पंय्या के अस्तित्व को बचाने का मतलब अपनी आने वाली पीढी़ को एक पवित्र एवं खूब सूरत गिफ्ट देना।

हमारा प्रयास
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– डा0 विजय कान्त पुरोहित
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