व्यंग्य: चुनाव है साहब…

शौर्य
ललित शौर्य, प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद

वो अब मंदिर जाने लगे हैं। किसानों की बात करने लगे हैं। गरीबी और बेरोजगारी उनको कचोटने लगी है। घबराइये नहीँ उन्हें ऐसा वैसा कुछ नही हुवा है बल्कि चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। देश के नेताजी का ह्रदय परिवर्तन पांच साल में एक बार होता है, जब चुनाव होते हैं। भारतीय नेता चुनाव में भूली बातों को याद करते हैं।

मुद्दों का बिस्तरबंद खुलने लगता है। वादों की पोटली की गांठे ठीलि पढ़ने लगती हैं। सपनों की चादर बिछने लगती है। नेताजी बाजीगर हैं, जादूगर हैं। अपनी जादुई छड़ी से वो काल्पनिक दिव्यलोक खड़ा कर देते हैं। जनता के मन-मस्तिष्क में आशा और विश्वास के घोड़े दौड़ने लगते हैं। आँखों में विस्वास की मछलियाँ तैरने लगती है। हर तरफ मख्खन से भरे घड़े दिखाई देने लगते हैं। ऐसा हर धर्म जाति मजहब के लोगों को महसूस होता है। चुनाव से पहले खुशहाली के सपनों से जनता का दिल गदगद होने लगता है। नेताजी के भाषण की डोज से सब अपने गम भुलाने लगते हैं। चुनाव से पहले कुछ-कुछ होने लगता है। बेरोजगारो के मन में रोजगार की गौरैय्या फुदकने लगती है।

सरकारी कर्मचारी को बढ़ती पगार के सुनहरे दृश्य दिखाई देने लगते हैं। महिलाओं को नेताजी या नेताइन में महंगाई रूपी महिसासुर का मर्दन करने वाली दुर्गा माँ के दर्शन होने लगते हैं। बुजुर्गों को चुनाव के समय तीर्थ और धाम नजर आते हैं। ऐसा चुनाव से पहले खूब होता है।क्योंकि ये चुनाव है। जो अगले पांच सालों में नही होने वाला है वो सबकुछ चुनाव के समय होता है। सपनों का भव्य लोक चुनाव के समय दिखाई देने लगता है। वोटर की आँखें चमकने लगती है। वो गुब्बारे की तरह फूलने लगता है। वादों की हवा वोटर के भीतर भरी जाती है। नेताजी चुनाव के समय विनम्रता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर डालते हैं। चुनाव के समय उनके पास उतना ही समय होता है जितना समय डिग्री धारक बेरोजगार युवा के पास होता है। इस समय नेताजी बिना बुलाये घर पर धमक जाते हैं।

नेताजी के संस्कार छलकने लगते हैं। छोटे-छोटे बच्चों के सामने नेताजी जी कर बद्ध हो जाते हैं, बुजुर्गों के सामने नतमस्तक, महिलाओं के सामने शीश झुका देते हैं। ये चुनावी संस्कृति का सर्वोच्च शिखर है। चुनाव के समय लॉलीपॉप, झुनझुने खूब बिकते हैं। किसी छोटे बच्चे की तरह वोटरों को ये खूब लुभाते हैं। चुनावी रंग होली के रंग से भी तगड़ा होता है। इसकी लालिमा खून से गहरी होती है। चुनावी सीजन में शेर मेमने बन जाते हैं। चुनाव में सब जायज है ठीक उसी तरह जैसे साली और जीजा के बीच हँसी ठिठोली जायज है। चुनावी मौसम का मजा लीजिये और हाँ नेताजी की बातों को सीरियसली मत लीजियेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *