… मेम साहब के गालों को चूम रहा था बेशर्म

व्यंग्य – लघुकथा – श्वान की व्यथा

– सलीम रजा

 दिन भर भा-गम-भाग और खाने की जुगत में एक दूसरे के उपर जिस्मानी हमलों के बाद दिन छिपते ही सुलह करके झुंड में बैठने की कला में पारंगत श्वान से कोई भी सीख नहीं लेता। बहरहाल, रात के घुप्प अंधेरे में पॉश कालोनी की गली में 10-12 श्वानों का झुंड बैठकर घरों में पलने वाले श्वानों के बारे में जिक्र कर रहा था।

एक श्वान कह रहा था कि आगे 5 मकान छोड़कर सोशल वर्कर के घर में श्वान अपने आप को बहुत इतरा कर दिखाता है। एक दिन मैं भूलवश उसके दरवाजे पर पहुंच गया। तो पता है उसने मुझे बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा, जैसे मैं उसकी बिरादरी का हूं ही नहीं।

दूसरा श्वान बोला, ‘‘अरे यार तू मेरी बात सुन, कालोनी से घुसते ही वो फैक्टरी वाले साहब के घर जो श्वान है, वो विदेशी है। पता है मेम साहब उसे गोद में लेकर बड़े प्यार से किस कर रही थीं। पता है वो भी मेमसाहब के गालों को चूमे जा रहा था, बेशर्म। अभी वो आगे कुछ और कहता उसी झुण्ड में से एक तनदुरूस्त से गठीले जिस्म का श्वान बोला आगे तीन घर छोड़कर वो किसी पार्टी के नेता जी रहते है ना, मैं उनके घर में चला गया पता है।’’

वो मुझे देखकर कूं-कूं करने लगा मैंने कहा डरो मत क्या बात है? श्वान बोला मेरा मालिक बहुत स्याना है। पता है दिन भर घर से बाहर रहता है तो घर में नौकर नये-नये लोगों को लाता है और कमरा बंद कर लेता है। मुझे बाहर रूखा-सूखा खाना डालकर बांध देता है। रात में साहब रोज नये-नये लोगों को लेकर कमरे में बन्द हो जाता है और मुझे फिर बाहर अकेला बांध देता है। तुम तो अच्छे हो कम से कम स्वतंत्र होकर जहां मन चाहे घूम तो सकते हो।

आखिर में अपनी आंख खोलता हुआ उन श्वानों में से सबसे उम्र दराज श्वान बोला, ‘‘मैं बहुत देर से सुन रहा हूं तुम सबकी बातें। मेरी भी सुनोगे तो बताऊं। कालोनी में घुसते ही दाहिने हाथ को जो मकान है, पता है किसका है। उम्र दराज श्वान बोला वो पत्रकार का मकान है उनके घर जो श्वान है ना, उससे मेरी बातचीत हुई। वो कह रहा था मेरा मालिक बहुत भला इंसान है। अपने खाने से पहले मेरे पेट का ख्याल रखता है। वो मुझ से कहता है कि नजर सब पर रखो लेकिन भौंकने में अपने विवेक का इस्तेमाल करो। मैं तो अपने मालिक से बहुत ही खुश हूं। सबसे बड़ी बात ये है कि मेरा मालिक आदेशात्मक भाषा का कतई इस्तेमाल नहीं करता। हमेशा संघर्षशील रहकर काम करवाने में यकीन रखता है।’’

उम्र दराज श्वान बोला, ‘‘एक बात बताओ तुम हम लोगों की बिरादरी से अलग घरों में स्लेव की जिन्दगी जीने से खुश हो।’’ वो श्वान एक लम्बी सांस भरते हुये बोला, ‘‘ऐसा नहीं है मेरे भाई, सबका समाज होता है। ऐसे ही हमारा भी समाज है, कोई भी गुलामी की जिन्दगी नहीं जीना चाहता। लेकिन मेरे भाई जरा ठंडे मन से सोचो अगर सुरक्षा, प्यार और सवच्छ वातावरण मिले तो वो जिन्दगी गुलामों की जिन्दगी नहीं कहलाती।’’

उम्र दराज श्वान विचलित हो गया बोला, ‘‘ये बताओ तुम में और हम में क्या फर्क है? तुम तब भोंकते हो जब कोई तुम्हारे दरवाजे पर आ जाता है। जबकि हम गली में किसी के कदमों की आहट मात्र से भौंक कर खौफ पैदा कर देते हैं।’’ पत्रकार का श्वान बोला, ‘‘यही सबसे बड़ी गलती है तुम्हारी, तुम्हारे उदण्डात्मक कार्यों से, तुम्हारी निष्ठा, ईमानदारी और कर्तव्य परायणता दब कर रह जाती है। इसीलिये लोग तुम्हारे लोगों की आमद मात्र से अपने दरवाजे बन्द कर लेते हैं। मैं मानता हूं कि तुम लोग अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हो लेकिन यहां हमारे और तुम्हारे बीच वैचारिक मतभेद है।’’

सभी श्वान चिन्ता मग्न हो गये और सोचने लगे कि वैचारिक मतभेदों ने ही इंसानी समाज से लेकर पशु समाज तक सबको विभाजित किया है। आज सब उस दोराहे पर खड़े हैं, जहां इस मतभेद से अनुशासन का दम घुट गया। ईमानदारी आत्महत्या कर रही है और बेचारगी, लाचारी हाथ पसारे खड़ी अपने गुनाह बख्शवा रही है। यही कारण है लोग अपने हकों को मांगने के लिये उदण्डात्मक कार्यों पर उतारू है। इस कार्यवाही पर इन्हें भी सजा मिलती है, फिर सोचो हम तो पशु हैं। इंसान को तो जुल्म सहने की आदत है। कहते हैं कि जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाला ज्यादा दोषी है।

हम अपनी प्रवृत्ति कैसे बदल सकते हैं? भले ही हम लावारिस आवारा कहलाये जाते हैं। क्यों ना लोग हमारे उदण्डात्मक कार्यों की सरे आम भर्त्सना करे। लेकिन अन्दर ही अन्दर वो हमारे इस कृत्य से अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। इंसान और पशु समाज में से कोई भी ऐशो आराम के साथ गुलामी की जिन्दगी जीता है, उसकी स्वार्थी प्रवृत्ति उसका अस्तित्व खो देती है। –साभार

Sushil Kumar Josh

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