लाइकेन; पर्यावरण प्रदूषण को पहचानने का सशक्त माध्यम -जानिए खबर

– प्रो0 ललित तिवारी

नैनीताल। हिमालयन अध्ययन पर राष्ट्रीय मिशन, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, तथा जैव प्रौद्योगिकी परिषद् उत्तराखंड -हल्दी द्वारा प्रायोजित एवं कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित लाइकेन के परंपरागत एवं आणविक विधि पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्धघाटन फेलो ऑफ नेशनल अकादमी एवं N.B.R.I. लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. डी. के. उप्रेती ने किया।

उन्होंने कहा कि लाइकेन पर्यावरण प्रदूषण को पहचानने का सशक्त माध्यम है तथा सतत विकास के क्रम में इनका संरक्षण अनिवार्य है ये छोटे जरूर है पर पारिस्थिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है. विशिष्ट अतिथि जैव प्रौद्योगिकी परिषद् उत्तराखंड के निदेशक प्रो डी के सिंह ने कहा कि लाइकेन को जैव प्रोद्योगिकी की विधियों से संरक्षित किया जा सकता है।

Lichen environmental pollution

कार्यक्रम की अध्यक्ष्ता कर रहे निदेशक भीमताल प्रो पी सी कविदयाल ने कहा की लाइकेन आर्थिकी में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं किन्तु इनका संरक्षण गंभीर विषय है। विभागाध्यक्ष प्रो वीना पांडे ने सभी का स्वागत किया तथा कार्यशाला के सयोंजक डॉ संतोष के उपाध्याय ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की. कार्यक्रम का संचालन प्रो0 ललित तिवारी ने किया। इस अवसर पर डॉ अर्चना शाह नेगी, प्रो एल के सिंह, डा0 ऋषेंद्र कुमार सहित दिल्ली, गढ़वाल, मेरठ, मुरादाबाद, चम्पावत, पिथौरागढ़ के १९ प्रतिभागी, शोधार्थी शामिल रहे

तकनीकी सत्र में डॉ . डी. के. उप्रेती ने अपने व्याख्यानं में कहा की विश्व में लाइकेन की २० हजार प्रजातियां ज्ञात है तथा भारत में २७१४, मात्र विश्व में ५०० प्रजातिया की आर्थिक उपयोगिता ज्ञात है तथा भारत में १६० प्रजातियों की औषधीय उपयोगिता ज्ञात है। डॉ उप्रेती ने भारत में हो रहे लाइकेन शोध कार्य पर प्रकाश डालते हुए भारतीय लाइकेन के पिता प्रो डी डी अवस्थी को नमन किया। उन्होंने कहा की लाइकेन पत्थर की चट्टानों को आवास में बदलने वाला जीव है।

उन्होंने बताया की हैदराबादी बिरयानी का राज पारमोट्रीमा रेटिकुलेतम लाइकेन की सुगंध है। तथा लाइकेन नैनोकण रंजक, मसाले बनाने सहित इनकी पहचान रासायनिक रंगो से की जाती है। यह उत्तराखंड की टनकपुर एवं रामनगर मंडी में बिकता है. लाइकेन सूक्ष्म एवं शैवाल एवं कवक का एक सहभागिता रिश्ता है जो अपने साथ साथ प्रकृति के साथ भी महत्वपूर्ण रिश्ता बनाया हुआ है। लाइकेन पश्चिमी हिमालय, उत्तर पूर्वी राज्यों तथा समुद्र के तटीय क्षेत्रो महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु में सर्वाधिक मिलते हैं।

वर्तमान में इसरो तथा अन्य संस्थान भी लाइकेन में शोध कर रहे हैं। लाइकेन पर्यावरण में संतुलन स्थापित करते हुए प्रदुषण मापक का कार्य भी करते हैं। कार्यशाला तीन दिन चलेगी। शुक्रवार को डॉ योगेश जोशी, जयपुर एवं डॉ राजेश बाजपेई व्याख्यान देंगे तथा शनिवार को अपराह्न में समापन समारोह पर पर डॉ रणवीर सिंह रावल, निदेशक पर्यावरण संस्थान कटारमल व्याख्यान देंगे।

बता दें कि आज की इस कार्यशाला में डॉ विवेक कुमार, डॉ, सुनील कुमार, डॉ अनिल डॉ, ममता डॉ सुनीति कुटियाल, दीपा, विदिशा, स्वाति, दीपक, आशुतोष, अंकिता अमृता हिमानी राहुल, अभिषेक इत्यादि उपस्थित रहे। अभ्यार्थियों ने लाइकेन का प्रयोगात्मक ज्ञान भी लिया।

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