भक्त के जीवन में सद्गुरु की महिमा – कृपा सागर

दो चार हों, दस बीस हों, सैंकड़ों हज़ारों हों, साधारण सत्संग कार्यक्रम हो या कोई विशाल समागम, उन्हें एक साथ बैठाने वाल होता है सद्गुरु। सद्गुरु ही उन्हें अनेक भिन्नताओं के बावजूद एकता के सूत्र में पिरोकर एक परिवार का रूप देता है।

घर से चलते हैं तो सभी के साथ अपनी-अपनी सांसारिक अथवा सामाजिक पहचान जुड़ी होती है। मगर जैसे ही सत्संग में कदम रखते हैं सभी को एक ही पहचान मिलती है भक्त की, जो उन्हें सद्गुरु से प्राप्त होती है और सद्गुरु जिस धागे से अनेकता को एकता प्रदान करता है उसका नाम है – ब्रह्मज्ञान। भक्त जैसे-जैसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके सत्संग में एकत्रित होते हैं, इस महान एवं विशाल परिवार का अंग बनते चले जाते हैं। उनके विचारों, उनके वचनों एवं कर्म में समानता आती चली जाती है। वह सभी अब सद्गुरु द्वारा प्रदान किए गए ब्रह्मज्ञान के आधार पर ही मन-वच-कर्म को ढालते हैं।

सद्गुरु द्वारा दिए गए ब्रह्मज्ञान से जब मन को स्वच्छता प्राप्त होती है तो मन की सभी प्रकार की दूषित भावनाएं शुद्ध, कोमल तथा कल्याणकारी भावनाओं को स्थान दे देती हैं। कोई व्यक्ति पराया नहीं लगता, सभी अपने दिखाई देते हैं। अब कड़वी भाषा किसी को घाव नहीं देती, मीठी बोली सब को प्रभावित करती है तथा अपनी ओर आकार्षित करती है। कर्म करके भी भक्त अब किसी को हानि नहीं पहुँचाते, सभी का भला करते चले जाते हैं।

सद्गुरु का भक्त के जीवन में वही स्थान है जो सूरज का प्रकृति में। सूरज प्रकृति के किसी भी अंग को छोटा या बड़ा करके नहीं देखता, जड़ हो या चेतन सभी को समान रूप से प्रकाश तथा ऊर्जा देता चला जा रहा है। अनाज कोई हो फसल कोई हो सूरज ने तो उसे पकाना है। फूल कोई हो सूरज ने तो उसे खिलते हुए देखना है। फल कोई हो कहीं हो किसी देश में हो सूरज सभी को रस प्रदान करता है। समुन्दर कहीं भी हो सूरज ने तो उसके जल को बादलों तक पहुँचाना है और जब कहीं बर्फ बन जाए तो उसे फिर जल का रूप प्रदान करके समुन्दर की ओर अग्रसर करना है।

इसी प्रकार सद्गुरू भी भक्तों को समान आशीर्वाद प्रदान करके उन सभी के जीवन में हरियाली लाकर उन्हें सुख, समृद्धि तथा खुशहाली का भागीदार बनाता है। भक्त पुरुष हो, स्त्री हो, किसी जाति, धर्म अथवा संस्कृति से आया हो, सद्गुरु सभी को एक सुन्दर जीवन प्रदान करता है। सद्गुरु भक्तों के कष्ट दूर करने के लिए डाॅक्टर, वकील, सलाहकार, रक्षक कुछ भी बनने को तैयार है। कई बार तो ऐसा लगता है कि सद्गुरु से बढ़कर हमारा अपना अथवा सगा-सम्बन्धी ही कोई नहीं। इसलिए भक्त के जीवन में किसी प्रकार का कष्ट हो, कोई भी समस्या या कमी हो वह सद्गुरु के आशीर्वाद की ही कामना करता है।

सद्गुरु, अपने संतों को अपना स्वरुप प्रदान करता है। ब्रह्मज्ञान देकर अपनी पहचान तो पहले ही प्रदान कर चुका होता है, अब अपना आसन तथा दुपðा देकर अपनी सभी आध्यात्मिक शक्तियों को भी भक्तों के कल्याण के लिए प्रयोग करने की आज्ञा दे देता है। सत्संग के समय सद्गुरु के आसन पर किसी भी संत को बैठाया जाता है और साध संगत उसे ही नमस्कार करके सद्गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करती है। उनकी उस संत के चरणों में की गई नमस्कार ही सद्गुरु द्वारा परवान की गई मानी जाती है। अतः यह सद्गुरु की बहुत बड़ी महिमा है कि वह संतों के घट में बैठकर भी हम भक्तों का मार्गदर्शन करता है, आशीर्वाद प्रदान करता है।

सद्गुरु की महिमा के संदर्भ में प्रायः एक शब्द प्रयोग किया जाता है – गुरमत। गुरमत का शाब्दिक अर्थ है – गुरु की मति यानि जो गुरु चाहता है, आदेश देता है। परन्तु हम यहाँ संत निरंकारी मिशन में देखते हैं कि सद्गुरु यह तो कदम-कदम पर बता रहे हैं कि भक्त का जीवन कैसा होना चाहिए परन्तु उसे आदेश का रूप कहीं नहीं दिया गया जहाँ ऐसा न करने को अवज्ञा समझा जाए और दोषी को दण्ड का भागीदार।

उदाहरण के तौर पर ब्रह्मज्ञान देने से पहले हर भक्त को मिशन के पाँच मूल सिद्धान्त समझाए जाते हैं जिन्हें पाँच प्रण भी कहा जाता है। ये पाँच प्रण भक्त को ब्रह्मज्ञान से जीवन में लाभ लेते समय अहंकार तथा घृणा जैसी रुकावटों के प्रति जागरूक तथा सतर्क तो करते हैं परन्तु उन्हें गुरु के आदेश का रूप नहीं दिया जाता जहाँ वह प्रतिबन्ध का रूप धारण करते हों और उनकी अवज्ञा का कोई दण्ड मिलने वाला हो। ये पाँच प्रण भक्तों को ब्रह्मज्ञान से जीवन में लाभ लेते समय अहंकार तथा घृणा जैसी रूकावटों के प्रति जागरूक तथा सतर्क तो करते हैं परन्तु उन्हें गुरु के आदेश का रूप नहीं दिया जाता जहाँ वह प्रतिबन्ध का रूप धारण करते हों और उनकी अवज्ञा का कोई दण्ड मिलने वाला हो। ये पाँच प्रण निरन्तर प्रेरणा का विषय बने रहते हैं जिनके प्रति हर भक्त को कदम-कदम पर सजग किया जाता है।

यहाँ भक्त की जाति या धर्म को बदला नहीं जाता परन्तु उसका अभिमान न करे यही समझाया जाता है। इससे भक्त किसी की जाति या धर्म को नीचा करके नहीं देखेगा। किसी से नफ़रत नहीं करेगा और टकराव से भी बचा रहेगा। मिशन के अन्दर तो किसी की जाति अथवा धर्म के सम्बन्ध में पूछा ही नहीं जाता, चर्चा ही नहीं होती।

इसी प्रकार भक्त को यह भी समझाया जाता है कि दूसरों के खाने-पीने और पहनने को लेकर भी उनकी आलोचना न करें, उनसे नफ़रत न करंे। इससे भी भक्त को दूसरों के साथ टकराव से बचा लिया जाता है।

सद्गुरु केवल यही चाहते हैं कि भक्त अपनी पारिवारिक, सामाजिक तथा अन्य हर प्रकार की ज़िम्मेदारियों को निरन्तर निभाते चले जाएं और उसी जीवन में ब्रह्मज्ञान का लाभ लेते जाएं ताकि जीवन में वास्तविक सुख और आनन्द प्रवेश करते रहें।

इसीलिए भक्त को संतों के संग अथवा सत्संग, सेवा तथा सुमिरण के लिए भी प्रेरित किया जाता है। यहाँ भी कोई बन्धन नहीं जिसके खण्डन से कोई दण्ड मिलने वाला हो। प्रेरणा के लिए इनके लाभ तो बताए जाते हैं परन्तु यदि किसी कारणवश कोई भक्त कहीं चूक कर जाता है तो ब्रह्मज्ञान उसके जीवन से सदा के लिए निकल नहीं जाता है। उसका लाभ, उसका मार्गदर्शन बना रहता है और वह जिस भी अपने कर्म में निरंकार अथवा ब्रह्मज्ञान को शामिल कर लेता है वह भी भक्ति बनता चला जाता है। और यही गुरमत है।

जब कुछ नया प्राप्त होता है तो भक्त उसके लिए अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता है और यदि कोई कमी आ गई है संकट आ गया है तो उसके लिए मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद की कामना करना है। संतों को घर बुलाकर उनकी सेवा करता है क्योंकि संत सद्गुरु स्वरूप होते हैं। संत प्रसन्न होंगे तो भक्त समझता है सद्गुरु प्रसन्न हो गए। और यदि सद्गुरु प्रसन्न हो गए तो स्वयं ईश्वर प्रसन्न हो गए।

इस प्रकार भक्त के जीवन के हर पहलू में सद्गुरु की महिमा बनी रहती है, सद्गुरु का महत्व बना रहता है। जीवन के उतार-चढ़ाव या संसार के प्रभाव के कारण यदि भक्त सद्गुरु से, साध संगत से कहीं दूर जाने लगता है तो भी सद्गुरु अपनी कृपा बनाए रखता है, किसी न किसी संत के माध्यम से उसका मार्गदर्शन करता है और फिर से उसे गुरमत के मार्ग पर, भक्ति के मार्ग पर ले आता है।

– लेखक सन्त निरंकारी मिशन का अनुयायी है।

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