अध्यात्म का अनूठा पर्वः यहां मनायी जाती है ब्रह्मा, विष्णु, महेश की होली

गढ़वाल देश का ऐसा पहला क्षेत्र है, जहां होली सिर्फ द्वापर या त्रेता में ही प्रचलित नहीं रही बल्कि गढ़वाल की होली कुमाऊं की होली से सैकड़ों वर्ष पुरानी है।

संभवतः गढ़वाल देश का पहला ऐसा क्षेत्र है, जहां होली सिर्फ द्वापर या त्रेता में ही प्रचलित नहीं रही, बल्कि वह सतयुग में ब्रह्मा, विष्णु, महेश की होली मानी जाती है।

जानकारी के मुताबिक उत्तराखंड में सतयुग के होली गीत (पृथ्वी संरचना को दर्शाते शिव की होली के गीत) प्रचलन में हैं। जैसे- श्जल बीच कमल को फूल उगो, अब भाई कमल से ब्रह्मा उगो, ब्रह्मा की नाभि से सृष्टि है पैदा, ब्रह्मा सृष्टि की रंचना करो।

यह उत्तराखंड हिमालय की होली का ऐसा पहला गीत है, जिसे सिर्फ गढ़वाल क्षेत्र में तब गाया जाता है, जब फाल्गुन शुक्ल सप्तमी को पंचांग गणना के अनुसार लोग पद्म (पय्यां) व मेहल के वृक्ष की टहनी काटकर लाते हैं।

होली गीतों में शिव का आह्वान

गढ़वाल के नृत्य गीतों में ब्रज के गीतों का गढ़वालीकरण ज्यादा हुआ है। इन होली गीतों की कई विशेषताएं ध्यान देने लायक है। मसलन, यहां होली गीतों में शिव का आह्वान हुआ है, जो मैदानी होली में नहीं दिखता।

महिलाओं के होली गायन की यहां अलग ही रीत है, जो स्वांग परंपरा के रूप में परिलक्षित होती है। इसके पीछे पहाड़ से पुरुषों का सामूहिक पलायन भी एक बड़ा कारण है। स्वांग परंपरा में विरह, रोमांस और पीड़ा है।

पुरुषार्थ की प्रतीक है होली

होली एवं उससे जुड़ी वसंत ऋतु, दोनों ही पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। इस अवसर पर प्रकृति सारी खुशियां स्वयं में समेटकर दुल्हन की तरह सजी-संवर जाती है। पुराने की विदाई होती है और नए का आगमन होता है।

पेड़-पौधे भी इस ऋतु में नया परिधान धारण कर लेते हैं। वसंत का मतलब ही है नया। नया जोश, नई आशा, नया उल्लास और नई प्रेरणा- यह वसंत का महत्वपूर्ण अवदान है और इसकी प्रस्तुति का बहाना है होली जैसा अनूठा एवं विलक्षण पर्व।

Sushil Kumar Josh

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