धरती को बचाने के लिए समय रहते करने होंगे प्रयास

विकास की अंधी दौड़ के दुष्परिणामों से धरती को बचाने के लिए समय रहते करने होंगे प्रयास

अंकित तिवारी

देहरादून। भारतीय परंपरा में प्रकृति के सह अस्तित्व पर जोर था लेकिन हर कीमत पर विकास की पश्चिमी प्रवृत्ति ने हमारे यहां भी बड़े पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दे दिया है हमें अपने मॉडल को पुराने सह अस्तित्व वाले मॉडल की ओर ले जाना होगा। भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह आगामी वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में 25% तक की कमी लाने का प्रयास करेगी।

गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्राकृतिक आपदाओं का आना हमें बार बार चेतावनी दे रहा है कि हमारी धरती हमारे ही क्रियाकलापों से विनाश की तरफ बढ़ रही है विकास की अंधी दौड़ के दुष्परिणामों से धरती को बचाने के लिए एक 22 अप्रैल 1970 से धरती को बचाने की मुहिम अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गई थी, लेकिन वर्तमान में धरती बचाने की हो रही कोशिशों को देखें, तो लगता है कि यहां दिवस आयोजनों तक ही सीमित रह गया है।

पर्यावरण असंतुलन दशकों से मानव जाति के लिए चिंता का सबब है, वास्तव में पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल ही नहीं हैं। पिछले कई वर्षों से दुनिया भर के ताकतवर देशों के कद्दावर नेता हर साल पर्यावरण संबंधित सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो, सह अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करें, इस सिद्धांत को पूरे विश्व में खासतौर पर विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ में भुला रखा है। वास्तविकता तो यह है कि पिछले 18 वर्ष में जैविक ईंधन के जलने की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 40% तक बढ़ चुका है, पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है, अगर यही स्थिति रही तो वर्ष 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 90% तक बढ़ जाएगी, हिमालय और दूसरे ग्लेशियरों के पिघलने की चिंता जताई जा रही है, वर्ष 1870 के बाद से समुद्री जल स्तर 1.7 मिनी की दर से बढ़ रहा है समुद्री जल स्तर अब तक 20 सेंटीमीटर के लगभग बढ़ चुका है, यदि ऐसा ही होता रहा तो एक दिन मॉरीशस जैसे कुछ देश और कई तटीय शहर डूब जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, चेतावनी दी जा रही है कि आने वाले समय में जीवन के लिए आवश्यक चीजें इतनी महंगी हो जाएंगी कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे, यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है, विकासशील देशों में जलवायु चक्र में हो रहे बदलावों का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कब बुवाई करें और कब फसल काटे, आशंका जताई जा रही है कि तापमान में बढ़ोतरी जारी रही तो खाद्यान्न उत्पादन 40% तक घट जाएगा, एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि तापमान में 1 डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीका में गृह युद्ध होने का खतरा 55% तक बढ़ा सकता है, और अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती है।

भारतीय परंपरा में प्रकृति के सह अस्तित्व पर जोर था लेकिन हर कीमत पर विकास की पश्चिमी प्रवृत्ति ने हमारे यहां भी बड़े पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है, हमें अपने मॉडल को पुराने सह अस्तित्व वाले मॉडल की ओर ले जाना होगा। भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह आगामी वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में 25% तक की कमी लाने का प्रयास करेगी, हालांकि यह बेहद मुश्किल लक्ष्य है लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी से इसे जरूर हासिल किया जा सकता है। दरअसल हमें अपनी दिनचर्या में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करना होगा हमें यह संकल्प लेना होगा कि पृथ्वी के संरक्षण के लिए हम जो कर सकते हैं वह करेंगे।

बेमौसम बरसात, गहराता पेयजल संकट, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं, विलुप्त होती प्रजातियां एक बेहद खतरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं, इन दिनों ना तो हमें चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देती है और ना ही हमारे घर के आस-पास आसमान में धवल पक्षियों की पंक्तियां ही नजर आती हैं, क्या आपको नहीं लगता कि पिछले दो दशक में हमने अपने पर्यावरण को नाश की ओर धकेला है तो क्यों ना कुछ ऐसा किया जाए कि स्थानीय पक्षियों की आबादी को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी छत पर उनके लिए घोंसला बनाएं या उनके दाने चुगने और पानी पीने का इंतजाम किया जाये?

प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढ़ियों का भी ,जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं, तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक के संसाधनों को सुरक्षित छोड़ जाएं कम से कम अपने निहित स्वार्थों के लिए एक उनका दुरुपयोग तो ना करें। अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी। इसलिए आज ही आज इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे या फिर अपने परिवेश में इसके विषय में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास करेंगे।

Sushil Kumar Josh

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