वादा ना निभाना : वादा तोड़ने के लिए किया जाता है

व्यंग्य: वादा ना निभाना

Lalit Sauriya
ललित शौर्य

वादा तोड़ने के लिए किया जाता है। ऐसे कई पुराने आशिकों का कहना है। केवल आशिक ही नहीँ वादा करने वाले एक्सपर्ट्स भी यही बताते हैं। वादे को सीरियसली नहीँ लेना चाहिए। अगर सीरियसली लिया गया तो दिक्कत वादा करने वाले को नही बल्कि जिससे वादा किया गया है उसकी दिक्कत है। दिक्कत की दिक्कत ना हो इसके लिए वादों को तवज्जो ना दें। प्रेमी ने प्रेमिका से वादा किया। वो बोला तेरे लिए चाँद तारे तोड़ लाऊँ। तेरी लिए पहाड़ झुका दूँ, नदियों का रुख मोड़ दूँ, तेरे लिए सारी दुनिया छोड़ दूँ।

कुछ महीने बाद वो किसी और के साथ सारी दुनिया को छोड़ता हुवा पाया गया। प्रेमी ने गुब्बारे में हवा भरकर आसमान की ओर छोड़ दिया। और वो गुब्बारे आसमान में चाँद -तारे तोड़ते हुए नजर आ रहे हैं। वादों का हाल चन्द दिनों में ही कटे हुए तरबूज की तरह हो जाता है। वादों की होड़ में हर आदमी अव्वल होता है, पर जब निभाने का वक्त आता है तो वादे निभाने के इरादे डगमगाने लगते हैं। भारत में जनतंत्र है। यहां जनता वादों को सहती है। वादों को ढोती है। वादे खेत में बोती है। पर वादों की फसलें उसने आज तक लहलहाती नहीं देखी। उसके कानों में वादों के बीज उढ़ेले गए पर उसकी आँखों को वादों की खेती नसीब नहीँ हुई। चुनावी रण में नेताजी वादों के शस्त्र से चुनाव लड़ते हैं। वादे जितने धारदार होते हैं चुनाव जीतने की संभावना उतनी ही प्रबल होती है। वादों से संग्राम फिर वादों से जीत और फिर पाँच साल आराम।

नेताजी जी को चुनाव के समय वादा करने की आदत होती है। वो ना चाहते हुए भी खूब वादे करते हैं। और चुनाव जितने के बाद उनको वादों का भी याद नहीँ रहता। वादा उनके लिए घर के खेत की मूली है जब चाह बो दिया जब चाहा उखाड़ के सलाद बनाकर चटक लिया। वादा करने के बाद और चुनाव जीतने के बाद नेताजी जी बिल्कुल भी वादा निभाने के मूड में नही रहते। उन्हें पाँच साल वादों से चिढ़ रहती है। कोई उन्हें पुराने वादे याद दिलाता है तो उनका मन सामने वाले के गाल में दो-चार रसीद करने का करता है। भला वादा करके कोई याद रखता है। वादा तो भूल जाने के लिए किया जाता है। अरे वादा नहीँ भूलेंगे तो आगे से वादा कैसे करेंगे। वादों से संवाद नही करते। वादों से विवाद नहीँ करते।बस वादा करते हैं। और वादा करके जबरन भूल जाते हैं।

नेताजी को वादों का आचार पसंद नहीँ। भला वो पाँच साल वादों का आचार चखने के लिए थोड़ी नेता या मंत्री बने हैं। उन्हें तो सत्ता की मलाई पसन्द है। वैसे भी राजनीति का मिजाज मलाई पसंद है। उन्हें वादे निभाने कहाँ आते हैं। नेताजी चुनाव जीतते ही पहली नफरत अपने किये हुए वादों से करते हैं। उन्हें वादे और वादे याद दिलाने वाले रास नहीँ आते। वादों की नैय्या से चुनावी बैतरणी पार करने वाले बाद में वादों को डुबो-डुबो कर मारते नजर आते हैं । और बस यही गुनगुनाते सुनाई देते हैं वादा ना निभाना… बनाना कोई बहाना…भैय्या वादा ना निभाना…।

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