आतंक का हथियार नशा : ललित मोहन जोशी

उत्तराखण्ड का युवा नशे की गिरफ्त में क्यों फंसता जा रहा है

ललित मोहन जोशी, अध्यक्ष, मानवाधिकार संरक्षण समिति उत्तराखंड

एजुकेशन हब के नाम से जाने, जाने वाले देहरादून में जिस तरह पहाड़ों के युवा नशे के गिरफ्त में फंस रहे है, वो निश्चित रूप से देवभूमि को कलंकित करने का कार्य है। जिस तरह अल्मोड़ा, बागेश्वर, देहरादून और उत्तराखंड के अन्य जिलों के युवा नशे के कारोबार में लिप्त हो रहे है इसके पीछे किन माफियाओं का हाथ है? पुलिस को उसकी भी जांच करना होगा। क्योंकि एक युवा जब पहाड़ से आता है तो स्मेक, कोकीन जैसे नशेली चीजों की तस्करी के लिए उन्हें कौन प्रेरित कर रहा है?

उसकी जड़ तक जाना अतिआवश्यक है। पहाड़ों की स्थिति से सभी लोग रू-ब-रू है कि किस तरह माँ-बाप अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते है, यहां तक माँ-बाप बच्चो को पढ़ाने के लिए अपनी जान तक गवा देते है, चाहे वो माँ अपना इलाज ना करा पाये, चाहे वो पिता देश की रक्षा और आतंकवादियों से लड़ते लड़ते शहीद हो जाये, चाहे वो माँ की छोटी सी उम्र में हाथों की मेहंदी मिट जाए या उसका सुहाग ही क्यों ना उजड़ जाये,

लेकिन अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिये वो अपना बलिदान दे देते है, माँ कभी अपने लिए दवा नही ले पाती, वो माँ अपने को अच्छे डॉक्टर को नही दिखा पाती, कहि उसके इलाज में ज्यादा खर्चा ना आ जाये और कहि बच्चों की सुविधा में कटौती ना हो जाये वो माँ-बाप जो लंबी दीर्घ आयु जी सकते थे बहुत ही कम उम्र में दुनिया छोड़ कर चले जाते है और बच्चे अपनी दुनिया बसाने के लिए उन अनमोल माँ-बाप को खो देते है।

ऐसे माँ-बाप के बलिदानों को नजरअंदाज कर नशे के दलदल में फस रहे युवाओं का देश और समाज के प्रति क्या कर्तब्य होगा? जब वो अपने माँ-बाप के प्रति अपने फर्ज को नही समझ सकते? देश के युवा आज किस तरह की डिग्रिया अर्जित कर रहे है? यह एक सोचनीय विषय है? क्या हमें नही लगता कि हम को अंतर्राष्ट्रीय आंतक से लड़ने के साथ साथ अन्तर्राज्यीय आंतकवाद से लड़ने की आवश्यकता है? जो नशे के आतंक से देश के युवाओं को नशे के दल दल में डालकर देश की जड़ों को खोखला कर रहे है।

क्या आज आंतक का हथियार नशा नही बनता जा रहा है? यह सभी समाज सेवियों, सभी पार्टियों और आम नागरिकों का कर्तब्य है कि जल्द जल्द इसकी जड़ों में जाना होगा जिससे फिर कोई परिवार बर्बाद ना हो, कोई बच्चा अनाथ ना हो, कोई माँ- बाप के बुढ़ापे की लाठी टूट ना जाये, फिर कोई माँ, बहिन और बेटी का सुहाग ना मिट पाये।

Sushil Kumar Josh

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