अंकल बिन पटाखे सब सून

व्यंग्य : बिन पटाखे सब सून

Lalit-Sauriya
इं. ललित शौर्य
प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उत्तराखंड

पटाखे बिना दीपवाली मतलब सब गड़बड़ झाला। बिना पटाखे छोड़े भला दीपावली हो सकती है। फिफ्त क्लास का बच्चा भी बता सकता है, अरे अंकल बिन पटाखे सब सून। दीवाली में पटाखे नहीँ छोड़े तो क्या छोड़ा। जैसे राजनीति में लम्बी-लम्बी और उँची-उँची छोडने का रिवाज है ठीक वैसे ही दिवाली में पटाखे छोड़ने का। जैसे संसद बिना शोरगुल के चल नहीँ सकती कुछ ऐसा ही दिवाली के साथ भी है, बिना पटाखों के दिवाली मनाई नहीँ जा सकती।

बिन पटाखे दिवाली, बोले तो बिना बैंड बाजे की बारात। भला ऐसी बारात में कौन नाचना चाहेगा। दिवाली में झूमने और उल्लसित होने के लिए पटाखों का धमाका जरूरी है। फिर राजा राम का उत्सव है, माँ लक्ष्मी को आमंत्रित करना है। घटाटोप अंधकार में यदि पटाखे ना चले, आतिशबाजी ना हो तो भला मातु लक्ष्मी अपने आशियाने तक कैसे पहुंचें। राजा राम जी को कैसे महसूस हो कि उनके आगमन पर लोग खुस हैं। पटाखों के साथ भयंकर वाली फीलिंग जुड़ी है। अगर दिवाली में पटाखे न छोड़ें तो फील ही नहीँ होता की दिवाली मनाई है। साहब फील होना भी तो जरूरी है। फिर अगर आतिशबाजी नहीँ होगी, पटाखे नहीँ छोड़े जायेंगे तो सोशल मीडिया का क्या होगा। दिवाली पर पटाखों और आतिशबाजियों के बीच कलाबाजियां खाती सेलफियाँ भला कैसे अपलोड की जाएंगी। स्टंट दिखाते विडियों देखने से संसार वंचित हो जायेगा। बुद्धिजीवी टाइप लोगों को ये समझना होगा, पटाखों से ही दिवालियत है। दिवाली से दिवालियत खींच ली जाये तो भला क्या बचेगा। इसलिए दिवाली सिर्फ हुलाला सॉन्ग पर थिरक कर तो मनाई नहीँ जा सकती। और हां सिर्फ पत्ते लगाकर या महंगी वाली दारू चढ़ाकर भी दिवाली सेलिब्रेट नहीँ की जा सकती। दिवाली के लिए पटाखों का फटना जरूरी है। धुएँ का गुबार जरूरी है।

पटाखों की बात चलते ही बुद्धिजीवियों की जुबान भी सरपट दौड़ने लगती है। उन्हें पर्यावरण का चीरहरण होते दिखाई देने लगता है। वो राम आगमन पर कृष्णअवतारी बनने की जुगत भिड़ाने लगते हैं। भले ही उन्होंने अपने अख्खे जीवन में एक पेड़ ना लगाया हो, पर वो मीडिया और कैमरे के सामने प्रदूषण का रोना रोने लगते हैं। पटाखों से ज्यादा उनकी पैंतीस साल पुरानी स्कूटर जो धुंवा छोड़ रही है उस पर बंदा खामोसी का कम्बल लपेट लेता है। दिवाली से पटाखों को दूर करने का षड्यंत्र चालू है। पर ये पब्लिक है सब जानती है। उसे पता है कब पेड़ लगाने हैं और कब पटाखे छोड़ने हैं। सुतली बम, तोता बम,अनार, चकरी अगर ना चली तो क्या चली। दिवाली में पटाखों का चलना शुभ शगुन है। भला पटाखे ना चलाकर मनहूसियत क्यों फैलाई जाये। पटाखों का क्रेज लबरेज है। पटाखों पर रोक सुहाग रात पर दुल्हन के घूँघट उठाने पर रोक सरीखी है। चिंटू,पिंटू को भला कौन समझाये। जो दिवाली से एक हफ्ते पहले से ही पटाखे दागने चालू कर देते हैं। खैर अब ये बात सब को पता है बिन पानी सब सून, ठीक इसी तर्ज पर बिन पटाखे दिवाली सून।

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