देवनागरी में लिखा काला अक्षर डायनासोर क्यों ? ललित शौर्य

व्यंग्य: हिन्दी और खाँसी साथ-साथ

Lalit-Sauriya
इं. ललित शौर्य
प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद, उत्तराखंड

बड़े लोगों को हिन्दी बोलते हुए खाँसी आती है। अगर कोई धड़ल्ले से बिना खांसे हिन्दी बोल जाये तो समझ लीजिये वो उतना बड़ा नहीं है, अभी उसके और बड़े होने की संभावना बरकरार है। कोई भी बन्दा तब तक बड़ा नहीँ हो सकता जब तक की वो फर्राटेदार अंग्रेजी न ठोके।

हमारे समाज में ठोक के अंग्रेजी बोलने वालों को बड़ा समझा जाता है। जो जितना अंग्रेजी में किटरपिटर करता है उसके बुद्धिमान होने की सम्भावना उतनी ही अधिक होती है। उसके बुद्धिजीवी होने का ग्राफ उतना ही अधिक बड़ जाता है। उसके तवज्जो का लेवल हाई होता है। उसकी सामजिक प्रतिष्ठा कुतुबमीनार सी ऊँची हो जाती है। अंग्रेजी को पढ़े-लिखों की भाषा माना गया है। अगर आप पढ़े लिखे होने के बावजूद भी अंग्रेजी में किट-पिट नहीँ कर सकते तो आप अघोषित अनपढ़ हैं। आपको अंदर ही अंदर कुढ़ना चाहिए। अपने ऊपर शर्म करनी चाहिए। अपने अस्तित्व को धिक्कारना चाहिए। आखिर आप अंग्रेजी क्यों नहीँ बोल पाते। हिन्दी से सम्मान नहीँ मिलता। गाँव में, महोल्ले में, बड़ों के बीच, छोटों के बीच, अगल में, बगल में कही भी सम्मान पाना है तो अंग्रेजी घोलनी पड़ेगी। अंग्रेजी बोलनी पड़ेगी। अग्रेजी हम भरतवंशीयों की सेकण्ड मदर बन चुकी है। नाम की सेकण्ड है पर हम भारतीय उसे लाड़ और सम्मान फर्स्ट मदर से से भी कई अधिक दे रहे हैं। हमारी पहली माँ हिन्दी को,माँ बोलते हुए अब नाक सिकुड़ जाता है, ओंठ कांपने लगते हैं। शर्म सी आने लगती है। अंग्रेजी को मदर या आंटी कहने में छाती 58 इंची हो जाती है। चेहरे पर रसमलाई सी मुस्कान दौड़ पड़ती है।

आज बड़े-बड़े मंचों पर वक्ताओं को अंग्रेजी में दौड़ते हुए पकड़ा जा सकता हैं। अगर गलती से उनसे हिन्दी उगली गई तो वो खांस पड़ते हैं। और अपनी खरास से हिन्दी को मुँह से बाहर धकेल फेंकते हैं। उन्हें हिन्दी और हिन्दीपन रास नहीँ आता। हिन्दी केवल गरीब की भाषा बनकर रह गयी है। रसूखदार हिन्दी को सुनते और कहते हुए बिदकने लगते हैं। उन्हें हिन्दी बोलने वाला कम बुद्धिमान लगता है। हिन्दी बोलने वाले के लिए उनके अंदर सम्मान का पैरामीटर बहुत ही लो है। वो हिन्दी बोलने वालों को नेगेटिव में भी सम्मान देना पसंद नहीँ करते।

देवनागरी में लिखा काला अक्षर अंग्रजी बोलने वालों के लिए डायनासोर

हिन्दी अब केवल हिन्दी दिवस पर ही पूछी और पूजी जाती है। साल के अन्य 364 दिन हिन्दी की बिंदी नोंची जाती है। उसके अस्तित्व को खत्म करने के लिए कमर कसी जाती है। हिन्दी दिवस पर हैप्पी हिन्दी डे का जुमला उछाल कर हिन्दी की आत्मा को भेंदा जाता है। उसे कचोटा जाता है। हिन्दी दिवस का सेलिब्रेशन भले ही जोर शोर के साथ मनाया जाता हो पर हिन्दी की डेथ सेरेमनी के लिए पूरे जुगाड़ किये जा रहे हैं।

नई पीढ़ी के लिए हिन्दी जंजाल बन चुकी है। देवनागरी में लिखे अंक उसके लिए काला अक्षर डायनासोर जैसा है। वन, टू और थ्री पढ़ने वाली पीढ़ी एक, दो, तीन से खौफ खाती है। वो पूछती नजर आती है अंकल ये अड़सठ का मतलब क्या होता है, पचत्तर कितने होते हैं। उन्यासी का मतलब 89 होता है ना। ये सब देख सुनकर भी हिन्दी दिवस पर गर्म पानी का गरारा कर, खांस-खंगार कर, भाषण चेपने का जी करता है।

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