आधुनिक मानव का गुरु है: केकड़ा

व्यंग्य: केकड़ागिरी

ललित शौर्य, प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद

गुरु वही जो चालाकी सिखाये, तिकड़मबाज बनाये। इस लिए केकड़ा आधुनिक मानव का गुरु है। केकड़ा समाज वर्षों से स्थिर है। वहीं का वहीं। केकड़े टांग खिंचाई में एक्सपर्ट होते हैं। वो हर समय एक दूसरे की टांग खीचते रहते हैं। यही कारण है कि केकड़ा समाज का कोई भी केकड़ा छोटे तालाबों से नदी में नहीं पहुंच पाया और नदी का केकड़ा समुद्र में नही घुस पाया। ठीक इसी तर्ज पर आज नेतासमाज और आम आदमी भी केकड़ा गुरु की भक्ति में लीन है। वो केकड़ागिरी मे मदहोश है। एक दूसरे की टांग खीचने में व्यस्त है। दूसरे की अवनति देख मस्त है। नेतागिरी में केकड़े को केकड़ा जी के सम्बोधन से बुलाया जाता है।

केकड़े जी की तस्वीरें नेताजी अपनी जेब में रख के घूमते रहते हैं। एक ही पार्टी के नेता भी अपनी ही पार्टी के भीतर केकड़ा चाल चलते हैं। एक दुसरे को नीचा दिखाने के लिए मचलते हैं। पक्ष और विपक्ष में तो केकड़ा वार दशकों से है। एक पार्टी की सरकार आई तो वो दूसरी पार्टी के निर्णयों को केकड़ा स्टाइल में नीचे खींच लेती है। ठीक उसी प्रकार अगले की सरकार आने पर वो पिछले के निर्णयों को पीछे धकेल देती है। इस प्रकार विकास भी केकड़ों की तरह अपने ही स्थान पर स्थिर है। उसे आगे बढ़ने ही नही दिया जाता है।

ेकड़ागिरी-दादागिरी, भाईगिरी, पप्पूगिरी सभी पर भारी है। आम समाज भी केकड़ागिरी के प्रभाव में है। टांग खीचना स्वभाव बन चुका है। केकड़ों की जमात बढ़ गया है। चारों तरफ केकड़ाई आवारण छाया हुवा है। केकड़ाई बादल बरस रहे हैं। केकड़ाई कोहरे की आगोस में पूरा समाज समाया हुवा है। खिचम-तान चली है। हमारा केकड़ापन हमको भाता है। केकड़ाई चाल ही हमको सुहाती है। देश आगे बड़ाने के नारे चल रहे हैं, विकास की बातें उछल रही हैं। साथ ही हमारे भीतर का केकड़ा कुलबुला रहा है। वो कुछ भी अच्छा होता नही देखना चाहता। आगे बड़ते कदमों को वो नोंच कर पीछे खींच रहा है। हर तबके में केकड़े बैठे हुए हैं। शासन-प्रशासन भी केकड़ों की कैद में हैं। विभिन्न विभागों में फाइलों में बैठे केकड़े फाइलों को आगे नही बड़ने देते। ये केकड़ागिरी अब हमारा अंदाज बन चुका है। जरा आप भी खुद को टटोलिये आपके भीतर कितना केकड़ापन है।

Sushil Kumar Josh

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