कैसे तुमसे प्रीत लगाई . . .

माँग लिया है झोली भरकर, साजन मैंने प्यार तुम्हारा ।
नयन झरोखें तुम्हे बिठाकर, दिवस रैन बस तुम्हें निहारा ।

तुम ही रब जैसे लगते हो , कैसे तुमसे प्रीत लगाई ,

बाँधा तुमको हृदय डोर से, दुनिया से मैं हुई पराई ।
कभी तिक्त है कभी शहद सा, अधर धरूँ जब प्यार तुम्हारा ।
नयन झरोखें तुम्हे बिठाकर, दिवस रैन बस तुम्हें निहारा …..

लगन लगी ऐसी प्रियतम पर, तन क्या मन भी वार चुकी हूं ।
बेचैनी यह कैसी पाली, चैन सुकूँ ही हार चुकी हूं ।
मखमल सम है कभी नरम तो, कभी खुरदुरा प्यार तुम्हारा ।।

नयन झरोखें तुम्हे बिठाकर, दिवस रैन बस तुम्हें निहारा…

प्रेम दिवानी बनी राधिका, श्याम रंग में मन मतवाला ।
भजती निशदिन मीरा रानी, मूरत ले गिरधर गोपाला ।
दिव्य प्रेम वश वन-वन डोलें, दोनों ही तजकर घर-द्वारा ।

नयन झरोखें तुम्हे बिठाकर, दिवस रैन बस तुम्हें निहारा

रीना गोयल, सरस्वतीनगर ( हरियाणा)

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