थाली के बैंगन की व्यथा

व्यंग्य: थाली के बैंगन की व्यथा

थाली का बैंगन बेचैन है। थाली में इधर उधर लोट रहा है। खुद अपने आप से बतिया रहा है। अपने अस्तित्व को कोस रहा है। उसे डर है अपने अस्तित्व के खोने का। बैंगन इसलिए परेशान नहीँ की उसकी डिमांड नही है। कोई उसका भर्ता नहीँ बना रहा। कोई उसकी सब्जी नहीँ बना रहा। बल्कि उसके यूँ खुद से खपा होने का अलग ही कारण है। बैंगन केवल सब्जी के लिए नहीँ जाना जाता, बैंगन पर एक बहुत पुरानी कहावत प्रचलित है। थाली का बैंगन। बैंगन को ये कहावत सुनकर प्राउड फील होता था।

वो ये कहावत सुनकर गुब्बारे की तरह फूल जाता था। लुढकना उसका जन्मजात गुण है। वो मौका देखकर थाली के किसी भी कोने में लुढ़क जाता था। पर आज थाली के बैंगन के हिस्से की चर्चा नेता लोग ले उड़े हैं। अब थाली के बैंगन नहीं थाली का नेता कहावत प्रचलित हो चली है। जिस पार्टी की थाली में ज्यादा माल दिखाई दे नेता उसी थाली की ओर लुढ़क रहे हैं। बैंगन इसी बात से क्षुब्ध है। वो अपने दिल की व्यथा सार्वजनिक करना चाहता है। इसलिए उसने पत्रकार सब्जीलाल को बुलाया। सब्जीलाल और थाली के बैंगन के बीच लंबी चर्चा हुई।

पत्रकार सब्जीलाल – श्रीमान् थाली के बैंगन जी आप परेशान क्यों हैं?

थाली का बैंगन – परेशान ना हों तो क्या करें पत्रकार सब्जीलाल जी। बात ही कुछ ऐसी है। थाली के बैंगनों का अस्तित्व खतरे में है। आज बैंगन को थाली में लुढ़कने में भी शर्म महसूस हो रही है। हमारे हिस्से की सारी लुढ़कन नेता लोगों ने छीन ली है। अब वो एक पार्टी से दूसरी पार्टी में इतना लुढ़क रहे हैं की हमें लुढ़कने का मन नहीँ करता।

पत्रकार सब्जीलाल – क्या लुढ़कना गलत बात है ? नेता आपके अस्तित्व से खेल रहे हैं या आपके अस्तित्व को मिटा रहे हैं इसके क्या सबूत हैं आपके पास?

थाली का बैंगन – नहीँ, लुढ़कना गलत बात नही है। हम तो कहते हैं सबको लुढ़कना चाहिए। आप भी लुढ़किए। यहां से वहां तक लुढ़किए। पर जो कहावत हमारे लिए मशहूर थी उसे तो हम से ना छीनिए। थाली का बैंगन हम थे। नेता हम से सीख कर हम पर हावी हो रहे हैं। हम आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम हड़ताल करेंगे। सारा बैंगन समाज एक होकर इस लड़ाई को लड़ेगा।

आप सबूत की बात कर रहे हैं। आपने नहीं देखा किस तरीके से नेता एक पार्टी से दूसरी पार्टी में घुसड़म घुसडू खेल रहे हैं। सुबह इस पार्टी के साथ दिन में किसी और पार्टी के साथ रात को डिनर में किसी और पार्टी के साथ। यही तो थाली का बैंगन होना है। पर ये थाली के नेता हैं। बैंगन हो भी नही सकते। थाली के बैंगन ने गुस्से में कहा।

पत्रकार सब्जीलाल – आप आंदोलन की बात कर रहे हैं, कौन साथ देगा आपके आंदोलन का?

थाली का बैंगन – हॉ, आन्दोलन होगा, विकट आन्दोलन, घनघोर आन्दोलन होगा। हम थाली के बैंगन हैं, हम अस्तित्व की इस लड़ाई में सर्वस्व न्यौछावर कर देंगें। और साथ देने की बात करते हैं आप। सारी सब्जी मंडी हमारे साथ है। और तो और हमें बाहर से भी बहुत लोगों का समर्थन प्राप्त है। नेताओं ने केवल हमारे अस्तित्व को ही चुनौती नहीँ दी है बल्कि गिरगिट और बिन पैंदी के लौटे का अस्तित्व भी खतरे में है। आज गिरगिट समाज भी अपने पर शर्म महसूस कर रहा है। इतने रंग तो गिरगिट समाज भी नहीँ बदलता जितने आजके नेता बदल रहे हैं। गिरगिट समाज भी हमारे साथ है। बिन पैंदी के लौटा समाज के पाँच लौटे कल शाम ही लोटते – लोटते हमारे पास आये थे।

उन्होंने कहा की आत्मसम्मान की इस लड़ाई में वो भी हमारे साथ हैं। उन्होंने कहाँ इतना तो हम जवानी में भी नहीँ लोटे थे जितना ये नेता बुढापे में एक पार्टी से दूसरी पार्टी में लोट रहे हैं। थाली का बैंगन जोश में था। वो बहुत कुछ कहना चाहता था पर पत्रकार सब्जीलाल को अभी भिन्डी समाज और लौकी परिवार का इंटरव्यू लेने भी जाना था। पत्रकार सब्जीलाल ने थाली के बैंगन से वादा किया वो ये इंटरव्यू मंडी मेल और सब्जी खबर दोनों अखबारों में लगाएगा। और वो वहां से खिसक लिया। थाली का बैंगन अपने दिल की व्यथा बताकर हल्का महसूस कर रहा था। वो मन ही मन जंतर – मंतर पर बड़ा आंदोलन करने की रणनीति तैयार करने लगा।

Sushil Kumar Josh

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