बाल्यावस्था में मक्खन चुराने सम्बन्धी श्रीकृष्ण का वृतान्त -जानिए खबर

श्रीकृष्ण मनोविकारों के विरूद्ध यु़द्ध में दक्ष थे

प्रायः लोग श्रीकृष्ण को एक राजनीतिक नेता, एक अजेय योद्धा, एक उच्च धार्मिक योगारूढ़ महापुरूष, एक कुशल राजदूत, एक प्रतिभाशाली रथवाहक, एक मनमोहक बालक, एक सहायक मित्र, एक निपुण मुरलीवादक के रूप में याद करते है। वे मुख्यतः इन्हीं रूपों में उसका गायन करते है। परन्तु प्राचीन अथवा अर्वाचीन ग्रन्थों में इन पहलुओ में श्रीकृष्णा की महानता को स्पष्ट करने के लिए जिन वृतान्तों का उल्लेख है वे प्रायः उसकी महानता के साधक नहीं बल्कि बाधक है।

उदाहरण के तौर पर श्रीकृष्ण के बाल्यावस्था में मक्खन चुराने सम्बन्धी जिन वृतान्तों का उल्लेख है, वे उन्हें ‘मोहन’ या ‘मनमोहन’ चित्रित करने के साथ-साथ उनमें चंचलता, अनुषासनहीनता, इन्द्रिय-निग्रह का अभाव, स्तेय वृृत्ति (चोरी) का अस्तित्व भी प्रदर्शित करते हैं।

द्वापर और कलियुग के मनभावने और लुभावने बच्चों का यह प्राकृत स्वभाव होता है इसलिए उस काल में कवियों ने अपनी कृतियों में श्रीकृष्ण के भी ऐसे ही स्वभाव को उभारा है। वे सोचते होंगे कि वह बच्चा ही क्या जो नटखट, हठी और चंचल न हो। लगता है कि वे भूल गए होगें कि श्री कृष्ण अपने हर आयु-भाग में विलक्षण थे।

मनमोहक इसलिए थे कि नैन उनके रूप को देखकर सुख पाते थे, जैसे सारा सौन्दर्य उनके ही रूप-लावण्य में मुग्ध हो गया हो, ऐसी उनकी छवि थी इसलिए उनमें बाल्यकाल की सरलता रही होगी, खेल-कूद भी उनको प्रिय होगा, वे लुकने-छिपने का खेल भीे खेलते होंगे, आँख मिचैनी भी करते होंगे, उनकी हँसी, उनका हावभाव और उनका हर क्रिया-कलाप मनमोहक रहा होगा परन्तु उसमें दिव्यता अवश्य रही होगी और जिन नियमों का योगी अभ्यास करते है, वे उन्हें जन्म ही से मिले होंगे।

इसी प्रकार हम देखते है कि अनेक ग्रन्थों में अर्जुन के साथ उनका जो (सखा भाव) दर्शाया जाता है, उसका उल्लेख करते द्रोपदी के होते हुए भी अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से करने को उद्यत दर्शाया है और इतना ही नही, द्वारका में जाकर एक सन्यासी वेश धारण कर, मन्दिर में जाती हुई सुभद्रा का अपहरण करने तथा उसकी रक्षा करने वालों को मार डालने तक की सलाह देने का भी उल्लेख किया है।

वास्तव में श्रीकृष्ण के बारें में ऐसा सोचना भी पाप है! क्योंकि उनके उज्जवल चरित्र के कारण तो उन्हे 16 कला सम्पूण और पुरूषोतम कहा जाता है। भारतवासी जानते है कि ग्रन्थकारों ने श्री कृष्ण की वाद्य-विद्या अथवा बाँसुरी-वादन की कला का तथा उसके रूप लावण्य का ऐसा उल्लेख किया है।

उन्होेने यह बताने में भी संकोच नहीं किया कि उनकी मुरली की तान सुनकर गोप-पत्नियाँ और यज्ञ-पत्तिनयाँ घर द्वार छोड़कर उनके साथ रास करती थी और उनके साथ उनका स्वछन्द व्यवहार हुआ और कि श्री कृष्ण की 16,108 रानियाँ थी जिनके डेढ़ लाख से अधिक बच्चे पैदा हुए।

सोचिए तो ऐसा भला श्री कृष्ण पर दोषारोपण करना क्या अपने ही दोषों के लिए छुटी पाने का यत्न करना नहीं है? उन्हें मुरली मनोहर तथा भगवान सिद्ध करते-करते उनमें स्तैण भाव नारी-अपहरण की चैष्ठा, कुमारियों का ऊल-जलूल उल्लेख लेखक के अपने मन की उचछखलता ही तो है।

फिर उसकी चतुराई का ऐसा प्रदर्शन किया गया है कि उसे अनैतिकता का रूप दे दिया गया है उदाहरण के तौर पर जरासंध को मारने के लिए उन्हें ब्राह्मण वेश धारण करके स्वयं किले में प्रवेश करता दिखया है और युद्ध के अन्तिम दिनों में भीम को यह अनुमति देते व्यक्त किया गया है कि वह दुर्योधन की रान (जंघा) पर गदा मारे। इसी प्रकार कर्ण को मारने के लिए भी उन्होंने अर्जुन को तत्कालीन युद्ध नीति विरूद्ध परार्मश दिया, ग्रन्थों में ऐसा वर्णन आया है।

और देखिये, उन्हें एक और योगीराज कहाँ गया है परन्तु दूसरी और योग की शिक्षा देते हुए भी, लड़ाई के लिए अर्जुन को उकसाते हुए दर्शाया गया है तथा स्वंय हजार रानियाँ रखते बताया गया है। स्पष्ट है कि आज लोगों को श्री कृष्ण की वास्तविक जीवन गाथा का ज्ञान नहीं है। वास्तव में तो श्री कृष्ण अपने पूर्व जन्म में मनोविकारो के विरूद्ध युद्ध कला में दक्ष थे।

वे अपने शरीर रूपी रथ के कमेन्द्रियों रूपी घोड़ों के संचालन की दृश्टि से कुशल रथवान थे। वे विश्व-शान्ति के सफल दूत थे, योगीराज थे और बाल सुलभ सरलता की मूर्ती थे तथा ज्ञान मुरली वादन में निपुण आत्मा रूपी गोपी को अर्तीन्द्रय सुख देने वाले थे। ऐसे ही उनके और चरित्रों पर प्रकाश डाला जा सकता है।

ब्रह्माकुमारी मन्जू

Sushil Kumar Josh

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