दूसरे के घरों को उजाला देने वाले आज अपने ही घर का चूल्हा जलाना के लिए मजदूरी करने को मजबूर

रूद्रपुर। मिट्टी गूंथकर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं हैं। जो कुम्हार दीपावली में दीयों से दूसरे लोगों के घर में उजाला करते हैं, वहीं उनको अपने घर का चूल्हा जलाना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। कुम्हारों के सामने रोजी रोटी का संकट गहराने लगा है। इसके चलते कई परिवार अपने परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। कुम्हार( प्रजापति) अब मिट्टी के बर्तन बनाने के बजाय मजदूरी करना उचित समझते हैं।

मुंडेली निवासी मंगल प्रसाद का मिट्टी के बर्तन बनाने का पुश्तैनी कारोबार है। अब मंगल मिट्टी के बर्तन बनाने के बजाय राज मिस्त्री का काम करते हैं। मंगल कहते हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाने में मजदूरी नहीं निकलती। दीपावली में ही दीये बानकर बेचते हैं। दीयों के साथ-साथ गुल्लक, मटकी, करवा, कुल्हड़ आदि बनाते हैं। दीपावली में ही पांच से सात हजार की दुकानदारी हो जाती है। मिट्टी के दीयों का कारोबार अब सीजनल रह गया है। उन्होंने बताया कि साल भर राजमिस्त्री का काम करके ही परिवार का भरण पोषण करते हैं।

मंगल प्रसाद के पांच बच्चे हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी है। तीन बेटियां व दो बेटे जिसमें एक बेटे विनोद कुमार ने बारहवीं में 93 प्रतिशत अंक प्राप्त कर उत्तराखंड की मेरिट में 21 वां स्थान प्राप्त किया है। इस समय विनोद दिल्ली में गणित में ऑनर्स कर रहा है। मंगल प्रसाद विनोद की आगे की पढ़ाई को लेकर खासे चिंतित रहते हैं। दो बेटियों का विवाह कर चुके हैं। यूं तो नगर व इसके आसपास प्रजापति समाज के खासे परिवार हैं। मंगल प्रसाद का कहना है कि वह लोग मूल रूप से फतेहपुर के रहने वाले हैं। 1989 में गांव में सूखा पढने पर मजदूरी की तलाश में वे लोग यहां चले आए। गांव से जब आए तो साथ में अपनी चाक भी लेकर आए। मंगल कहते हैं कि मिट्टी के बर्तन में कोई इनकम न होने की वजह से अधिकांश लोग पीलीभीत के कलीनगर से बने बनाए बर्तन, दीये, घड़े लेकर यहां बेच रहे हैं।

बाजार में पारंपरिक दीयों का चलन अब बेहद कम रह गया है। आधिकांश परिवार बिजली की झालरों से अपने घरों को जगमग करते हैं। मिट्टी के दीयों को केवल शगुन के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है। मंगल कहते हैं कि बाजार में दीयों का भाव 15 रुपये दर्जन है। जबकि इसमें उनकी मजदूरी तक नहीं निकलती। उन्होंने कहा कि कम से कम 25 रुपये दर्जन दीयों की कीमत होनी चाहिए।

कुम्हारों को बर्तन बनाने के लिए मिट्टी की व्यवस्था करना भी कम टेढ़ी खीर नहीं है। गांव में ग्राम समाज की जमीनें रही नहीं। तालाबों में भी लोगों ने अवैध अतिक्रमण किए हुए हैं। मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी सबसे महत्वूपर्ण है। मंगल बताते हैं कि वह नजदीक के जंगल से मिट्टी लेकर आते हैं। मंगल प्रसाद कहते हैं कि मिट्टी लाने एवं दीये बनाने से लेकर पकाने में जो खर्च हाता है। उस हिसाब से इस कारोबार में मुनाफा नहीं है। सदियों से चली आ रही इस कला को बचाने के लिए सरकारी मदद की दरकार है। गांव-देहात में आज भी कुम्हार (प्रजापति) की चाक के पूजन का हिंदू परंपराओं में विशेष महत्व है। विवाह समारोह के दौरान चाक पूजन के लिए घर की पांच से ग्यारह महिलाएं कुम्हार के घर जाती हैं। विधिविधान से चाक की पूजा की जाती है। इस दौरान चाक पूजन से संबंधित गीत संगीत भी होता है।

पूजन के बाद महिलाएं कुम्हार दंपति को दक्षिणा, वस्त्र भेंट करती हैं। चाक से बना कलश लेकर गणेश जी के सामने स्थापित करती हैं। चाक पूजन के बाद घर में धन धान्य की कमी नहीं रहती। इसका कोई वास्तविक आधार भले ही न हो, लेकिन यह पंरपराओं में कायम है। व्यवसायी दिनेश अग्रवाल बताते हैं कि अब कुम्हारों की चाक नहीं मिलती तो घरों में रखी दाल दलने वाली छोटी चक्की की पूजा कर रस्म निभाई जाती है।

Sushil Kumar Josh

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