मुक्ति के लिए विवेक जगाना ही पढ़ेगा “बिना सत्संग विवेक जागृत नही होता”: कुन्दन सिंह

देहरादून। सत्संग एक आध्यामिक पाठशाला है। सद्गुरू के ज्ञान के बाद जीवन के अन्दर बदलाव आने लगता है। आत्मा के कल्याण के लिए मनुष्य को अपना विवेक जगाना अतिआवश्यक है जैसे कहा भी गया है कि- ‘‘बिना सत्संग विवेक न होई’’। मनुष्य का विवेक सिर्फ सत्संग में जागृत हो सकता है जहां उसे अच्छे बुरे की पहचान होती है और वह सनमार्ग पर चलना शुरू करता है। इससे उसके जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। सन्तों की संगति से जीवन में आनन्द आता है। आत्मा इसी आनन्द को प्राप्त कर परमानन्द में लीन होकर मोक्ष की हकदार होती है।

बता दें कि रविवार को सन्त निरंकारी मण्डल, ब्रांच देहरादून के तत्वाधान में आयोजित रविवारीय सत्संग में चम्बा से पधारे सन्त पूज्य कुन्दन सिंह रावत ने अपने विचार प्रकट किये। उन्होंने आगे कहा कि बिना सत्संग के विवेक उत्पन्न नहीं होता है। सत्संग में सद्गुरु हमारी आत्मा को परमात्मा का बोध कराकर भक्ति करने का ढंग सिखाते है। इससे हमारी आत्मा, मन, बुद्धि सभी में निर्मल गुणों की उत्पत्ति होती है। दया, करूणा, प्रेम, मिलवर्तन, सहनशीलता के द्विव्य गुण प्रकट होने लगते है। तन-मन-धन की प्रफुल्लिता प्राप्त होने लगती है।

वहीं उन्होंने मीराबाई का उदाहरण देकर कहा कि जब तक उन्हें परमात्मा का बोध नहीं हुआ, तो वह बिलखती रही-अखियां हरि दर्शन की प्यासी। जब परमात्मा मिल गया, तो उन्होंने कहा-पायो जी मैनें राम रतन धन पायो। विश्व का सृजनहार परमात्मा है, जो सृष्टि के हर प्राणी मात्र को शक्ति प्रदान करता है।

सद्गुरू इस सर्वशक्तिमान परमात्मा की जानकारी देकर मनुष्य को उसके लक्ष्य परम अस्तित्व सत्य परमात्मा का बोध कराते है। आत्मा के निज घर का बोध ही मनुष्य जीवन का प्रथम एवं अन्तिम लक्ष्य है। आत्मा मन बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। इसकी पहचान ही स्वयं की पहचान है। जिन्होंने भी सद्गुरू की बात को माना उनके जीवन में हर प्रकार के आनन्द प्राप्त होने लेंगे।

सद्गुरू हमें नाम धन देते है, जिससे हमारे जीवन में हर तरह के कर्मकाण्डों से मुक्ति प्राप्त होती है। सत्संग समापन से पूर्व अनेकों प्रभु-प्रेमियों, भाई-बहनों एवं नन्हे-मुन्ने बच्चों ने गीतों एवं प्रवचनों के माध्यम से निरंकारी माता सुदीक्षा जी महाराज की कृपाओं का व्याख्यान कर संगत को निहाल किया। मंच का संचालन पूज्य रवि अहुजा जी ने किया।

– भगवान सिंह

Sushil Kumar Josh

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